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  • आज हमने 50 वर्ष की यात्रा तय की है। हमने बहुत से मोड़ देखे, बहुत सी ऊंचाइयां देखी, बहुत से कष्ट भी देखे। तमाम बाधाओं को पार करते हुए आज हम अच्छे राज्य के रूप में आगे बढ़ रहे हैं: हिमाचल प्रदेश के पूर्ण राज्यत्व दिवस के स्वर्ण जयंती समारोह में जे.पी.नड्डा   
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अपना धु्रवतारा पं. सतीश शर्मा, एस्ट्रो साइंस एडिटरव्, नेशनल दुनिया

दीपावली के 11 दिन बाद विवाह के मुहूर्त्त शुरु हो जाते हैं। वास्तु शास्त्र के भी अच्छे मुहूर्त्त दीपावली के 11 दिन बाद, देवउठनी एकादशी के बाद निकलने लगते हैं। विवाह के बाद एक प्राचीन परम्परा है जिसमें वर कुछ मंत्र पढ़ते हुए नववधू को ध्रुव तारे के दर्शन कराता है। ध्रुव भगवान विष्णु की तपस्या में इतना स्थिर था कि उसके स्थायित्व को देखते हुए भगवान विष्णु ने आकाश मण्डल में स्थापित कर दिया ऐसा पौराणिक कथन है। तारों की छाँव में विदा करने का अर्थ यह है कि ध्रुव तारे का दर्शन हो जाए। एक अन्य कथानक भी साथ चलता है कि सप्तऋषि मण्डल के वशिष्ठ और अरुन्धती तारा जो तारायुग्म है, उनके अलौकिक प्रेम को देखते हुए वशिष्ठ और अरुन्धती के दर्शन कराये जाते हैं।

सप्तऋषि मण्डल धु्रवतारे के चहुँओर ओर चक्कर काटता है। अगर चार दिशाओं में सप्तऋषि मण्डल की स्थिति बारी-बारी से देखी जाए अर्थात् धु्रव तारे से पूर्व में फिर ध्रुव तारे से पश्चिम में फिर धु्रव तारे के उत्तर में, फिर ध्रुव तारे के दक्षिण में। और उनके प्रमुख तारे कृतु और पुलह से ध्रुव तारे तक एक रेखा चारों दिशाओं में डाली जाए तो आश्चर्य होगा कि जो चित्र बनेगा वह स्वास्तिक  चिह्न का बनेगा। हम जानते हैं कि ब्रह्मा ने जो सृष्टि उत्पन्न की उसमें जो महत्त्वपूर्ण स्थान है। सृष्टि को जन्म देने में और आगे बढ़ाने में वो सप्तऋषि मण्डल को है यानि सात ऋषियों को। अर्थात् सप्तऋषि मण्डल का इतिहास उतना ही पुराना है जितना हमारे स्वास्तिक का, इसलिए हमारी पौराणिक अवधाराओं में स्वास्तिक इतना व्याप्त है।

प्राचीन काल में उत्तर दिशा के ज्ञान के लिए ध्रुव तारा बहुत अधिक मदद करता था। रात्रि की यात्राओं को धु्रव तारे के आधार पर ही तय किया जाता था। अगर हम ध्यान से आसमान के उत्तरी गोलाद्र्ध को देखें तो सप्तऋषि मण्डल के सात तारे दिखाई देते हैं और उसी दिशा में एक लघु सप्तऋषि मण्डल भी दिखता है। वस्तुत: हम जिसको सप्तऋषि मण्डल कहते हैं उसमें सात प्रसिद्ध तारे हैं और जिनका नाम ऋषियों के नाम के आधार पर रखा गया है। वैदिक काल में इसको ऋक्षा (रीछ) कहा गया है। पाश्चात्य ज्योतिष में भी या खगोल शास्त्र में भी इसको उरसा मेजर या बड़ा भालू कहा गया है।

वास्तव में लघु सप्तऋषि मण्डल में धु्रव तारा स्थित है और जिसे हम सप्तऋषि के नाम से जनते हैं उसके सात तारे ध्रुव तारे की परिक्रमा करते हुए जान पड़ते हैं। यदि सप्तऋषि मण्डल के जो चौकोर से चार तारे हैं उनमें से बाहर की तरफ के, सामने की तरफ के जो कृतु और पुलह दो तारों को यदि उत्तर की ओर बढ़ाया जाये तो वह रेखा ध्रुव तारे से जाकर मिलती है। ध्रुव तारे को पहचानने का एक तरीका और भी है। जो स्थान जितने उत्तरी अक्षांश पर स्थित होगा, आकाश में उतने ही अंश पर ऊपर धु्रव तारा नजर आएगा। उदाहरण के तौर पर जयपुर का अक्षांश 26-50 है तो जब हम जयपुर के आसमान की तरफ उत्तरी दिशा में देखेंगे तो करीब 27 अंश ऊपर धु्रव तारा नजर आएगा। धु्रव तारा जिस लघु सप्तऋषि मण्डल में स्थित है उसको भारतीय पुराणों में शिशुमार चक्र भी कहा गया है। शिशुमार चक्र के बाकी सारे तारे धु्रव तारे का पूरा चक्कर लगाते हुए देखे जा सकते हैं। शिशुमार चक्र का जो सबसे प्रमुख तारा है अल्फा तारा है। हमसे 472 प्रकाश वर्ष दूर है। हमारे सूर्य से बहुत बड़ा है यह धु्रव तारा, हमारे सूर्य के व्यास से 120 गुणा बड़े व्यास का है और सतह का तापमान हमारे सूर्य का 6 हजार डिग्री है परन्तु ध्रुव तारे की सतह का तापमान बहुत ज्यादा है। एक बहुत अद्भुत बात और है। पृथ्वी से देखने में हर चार दिन में ध्रुव तारे का आयतन घटता या बढ़ता  हुआ नजर आता है। इसका तापमान और जो इसकी कांति है वह भी कम ज्यादा होती है। ऐसे तारों को स्पंदी या सेफीएरी तारा कहते हैं। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि धु्रवतारा हमारे सूर्य से 10 हजार गुना अधिक प्रकाश और तापमान उत्सर्जित करता है।

करीब 2000 वर्ष से लघु सप्तऋषि मण्डल के अल्फा तारे को ध्रुव तारा माना जाता है। पृथ्वी का अक्ष चपटा होने की वजह से पृथ्वी जब अपने अक्ष पर घूमती है तो धु्रव तारे की स्थिति बदलती रहती है। आज से करीब 13 हजार वर्ष पहले लायरा नक्षत्र मण्डल, जिसे वीणा भी कहते हैं, उसका जो नक्षत्र है जिसको हम अभिजित नक्षत्र के नाम से जानते हैं, अंग्रेजी नाम वेगा है। वह धु्रव बिन्दु के काफी नजदीक था और बहुत चमकीला था। उस दिन से 26 हजार वर्ष में वह बिन्दु खिसक कर पुन: वहीं आ जायेगा। इसका अर्थ यह है कि जो उत्तरी धु्रव बिन्दु है वह आज से 13 हजार वर्ष बाद पुन: अभिजित नक्षत्र पर पहुँच जायेगा।  अर्थात् आज के धु्रव तारे के मुकाबले 13 हजार साल बाद जो पुन: अभिजित नक्षत्र होगा और उस पर जो धुव्र बिन्दु होगा और उस समय जो उत्तरी दिशा का ज्ञान कराएंगे वह बहुत चमकीला होगा। सम्भवत: इसीलिए जो वैदिक रचनाओं का काल है वो चमकीले ध्रुव तारे का उल्लेख करता है। इससे एक संकेत मिलता हैं कि वैदिक रचनाओं का जो काल है आज से 13 हजार साल पहले   बहुत अधिक सक्रिय था और अगले कुछ हजार साल तक उस चमकीले ध्रुव तारे की चर्चा करता रहा। 

जिस तारा मण्डल में यानि लघु सप्तऋषि में धु्रव तारा स्थित है, उसका उल्लेख शिशुमार चक्र के रूप में भी किया गया है।  श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध में शिशुमार चक्र का उल्लेख किया गया है। कहा गया है कि भगवान की योग माया के आधार पर स्थित इस ज्योतिष चक्र में शिशुमार कुण्डली मारे हुए है। यह एक जीव है और इसकी पूँछ के सिरे पर ध्रुव है, पूँछ के मध्य भाग में प्रजापति हंै, अग्रि, इंद्र और धर्म हंै, पूँछ की जड़ में धाता और विधाता है, कटि प्रदेश में सप्तऋषि हैं। ये दाहिनीं ओर सिकुड़ कर कुण्डली मारे हुए हैं और अभिजित से लेकर पुर्नवसु तक उत्तरायण के 14 नक्षत्र इनके दाहिने भाग में और बाकी सब बायें भाग में हैं। इनके उदर में आकाश गंगा है। शिशुमार चक्र का भारतीय पौराणिक कथन में और ज्योतिष में बहुत भारी योगदान है और सृष्टि की प्रारम्भिक रचनाओं या सृष्टि की उत्पत्ति के मूल में जो कथाएँ हैं कि ब्रह्मा ने सृष्टि को उत्पन्न किया उनमें सप्तऋषि मण्डल, लघु सप्तऋषि मण्डल और शिशुमार चक्र इन सब का उल्लेख प्रमुखता से आता है और भारतीय सारे कथानक सृष्टि के मूल कारण रूप में इन तारों की बहुत अधिक प्रशंसा करते हैं। हमारा ध्रुव तारा साधारण नहीं है, हमारे सौर मण्डल से बहुत बड़ा है। इससे सम्बन्धित जो भी नक्षत्र मण्डल हैं वे भी बहुत महान हंै। दिशाओं का निर्धारण इनसे करते हैं, स्वास्तिक चिह्न का इनसे सम्बन्ध बताया गया है, इसलिए भारतीय वाङ्गमय में धु्रव नक्षत्र की बहुत चर्चा है।

लक्ष्मी साधन

                भगवती लक्ष्मी

                गौ लोक में भगवती लक्ष्मी ने अपने नित्य रासमंडल में अपने आपको दो रूपों में प्रकट किया। दोनों रूप एक जैसे ही सौंदर्य से परिपूर्ण थे। वामाङ्ग से व्यक्त शक्ति चतुर्भुज रमा उत्पन्न हुई और दक्षिणाङ्ग से द्विभुज श्रीराधा उत्पन्न हुईं। दोनों की तुष्टि के लिए भगवान स्वयं दो रूपों में प्रकट हो गए। चतुर्भुज श्री नारायण रूप में रमा बैकुंठ में आ बिराजे और द्विभुज श्यामसुंदर रूप भगवान कृष्ण हैं। महर्षि दुर्वासा के श्राप से इन्द्र के साथ त्रिलोकी भी नष्ट हो गए। श्री नारायण के निर्देश से समुद्र मंथन में कई वस्तुओं के साथ लक्ष्मी जी भी प्रकट हो गईं। किसी ने आसन दिया, किसी ने वस्त्र, किसी ने स्नान तो किसी ने अंगराग। सबने माला, वस्त्राभूषणों से लक्ष्मी जी का सत्कार किया। उन्होंने सबकी सेवाएं स्वीकार की। हाथ में कमलों की माला लेकर महालक्ष्मी ने कामना रखने वाले किसी भी देव दानव को नहीं चुना। अत्यंत निरपेक्ष समुद्र मंथन के कार्य में लीन भगवान विष्णु का उन्होंने वरण कर लिया। भगवान के वक्ष के वामभाग पर जो स्वर्णिम रोमावली-आवर्त है श्रुतियों में कहा गया है, वही श्रीवत्स महालक्ष्मी का अमर धाम हो गया।

                भगवती महालक्ष्मी नित्य स्थिर, कमलासना, गरुड़सना या ऐरावत आरुढ़ या उलूकवाहन हो गई हैं। उलूकवाहन होकर बहुत चंचल भी हो गई हैं।

                ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लेख है कि लक्ष्मी का अवतरण कृष्ण भगवान की इच्छा से हुआ है। बहुत से लोगों को यह कहानी समझ में नहीं आती, परंतु कृष्ण का काल ऐसा काल है जिसमें भगवान कृष्ण से संबंधित समस्त शक्तियां पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं और उन्होंने अपनी-अपनी लीला कृष्ण भगवान के साथ ही पूरी की थी। क्योंकि पौराणिक आख्यानों के अनुसार लक्ष्मी ने समुद्र मंथन से उत्पन्न होकर भगवान विष्णु को पति रूप में स्वीकार किया था इसलिए कृष्ण को लक्ष्मी से अलग करके नहीं देखा जा सकता। श्री गर्ग संहिता में तो एक आख्यान ऐसा भी मिलता है कि लक्ष्मी जी की सखियां भी वृषभानुनियों के घरों में कन्या रूप में उत्पन्न होकर माघ मास का व्रत करती थीं और कृष्ण को रिझाकर पाने की चेष्टा करती थीं।

                बृज में 6 वृषभानु हुए हैं। नीतिवित्, मार्गद, शुक्र, पतंग, दिव्यवाहन तथा गोपेष्ट। इनके घरों में लक्ष्मीपति नारायण के वरदान से जो कुमारियां उत्पन्न हुई उनमें से कुछ तो रमा, बैकुंठवासिनी और कुछ समुद्र से उत्पन्न लक्ष्मी जी की सखियां थी और कुछ अजितपदवासिनी और कुछ ऊध्र्व बैकुंठ लोक निवासनिी देवियां थी, कुछ लोकाचल वासिनी, समुद्रसंभवा लक्ष्मी सहचर्या थीं। इन्होंने कृष्ण भगवान को रिझाने के लिए माघ मास का व्रत किया।

                एक कथानक के अनुसार माघ शुक्ला पंचमी को भगवान कृष्ण इन सखियों की परीक्षा लेने आए। उन्होंने व्याघ्रचर्म का वस्त्र पहना हुआ था, जटा मुकुट पहना हुआ था और समस्त अंगों में विभूति रमाए हुए योगी के वेश में वेणु बजाते हुए लोगों का मन मोहते हुए उधर आए। समस्त गोपियां आश्चर्य से बोलीं कि यह कौन बालक है जिसकी आकृति नंद-नंदन से मिलती है या यह किसी राजा का पुत्र है या किसी स्त्री के कठोर वचन के कारण वैराग्य को प्राप्त हुआ है। उन गोपियों ने पूछा- योगी बाबा तुम कौन हो, कहां से आए हो? तुम क्या करते हो? कौन सी सिद्धि तुमने पायी है? योगी ने कहा मुझे दिव्यदृष्टि प्राप्त है। मैं त्रिकालज्ञ हूँ तथा सभी विद्याएं जानता हूँ। गोपियों ने कहा तो हमारे में क्या है, बताओ? योगी ने कहा यह तो कान में कहने योग्य बात है। आप कहें तो मैं इस बात को सार्वजनिक कर दूं। गोपियां बोली, योगी तुम सच कहते हो इसलिए कुछ ऐसा करो कि जिसका चिंतन हम करती हैं, वे यहीं आ जाएं। उस योगी ने तुरंत अपने उस स्वरूप का दर्शन कराया, जिसकी गोपियां कामना कर रही थीं।

                इस आख्यान का उद्देश्य मात्र इतना है कि कृष्ण भगवान के समय के जितने भी नायक, उपनायक, नायिकाएं एवं उपनायिकाएं थीं वे सभी कहीं न कहीं से लक्ष्मी से संबंधित रही हैं। इसीलिए कभी-कभी संतान प्राप्ति या धन प्राप्ति के लिए कृष्ण या राधा का ध्यान करना बताया गया है।

                यमुना सहस्त्रनाम में यमुना का एक नाम सौंदर्यलहरी लक्ष्मी भी बताया गया है। यमुना के कुछ और नामों में कांचिनी, कांचिनी भूमि, कांचिनी भूमिभाविता, श्रीहारिणी जैसे शब्द भी आते हैं। यमुना के एक नाम में श्री कृष्ण चरणाङ्कस भी आता है।

कुबेर

                महर्षि पुलस्त्य के पुत्र महामुनि विश्रवा ने भारद्वाज की कन्या इलविला का पाणिग्रहण किया। उससे कुबेर की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी ने कुबेर को सभी संपत्तियों का स्वामी बनाया। ये तपस्या करके उत्तर दिशा के लोकपाल हुए और कैलाश पर्वत के समीप अलकापुरी इनका निवास है।

                श्वेतवर्ण, तुंदिल शरीर, अष्टदंत एवं तीन चरणों वाले गदाधारी कुबेर जी की सभा का नाम वैश्रवणी है, इनके पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव नारद के शाप से मुक्त होने के बाद इनके समीप ही रहते हैं और यज्ञ इनकी सेवा करते हैं।

                कुबेर के बारे में यह माना जाता है कि पृथ्वी में जितना कोष है, उसके अधिपति कुबेर हैं। भूगर्भ पर जो भी निधि है कुबेर की कृपा से ही प्राप्त होती है। निधि को सजीव और चल माना गया है। यह कहावत है कि यदि पुण्यात्मा हो तो रत्न, मणि आदि स्वत: उसके पास आते हैं। कुबेर जी मनुष्य के अधिकार के अनुरूप कोष का प्रादुर्भाव या तिरोभाव कर देते हैं। भगवान शंकर ने इन्हें अपना नित्य सखा स्वीकार किया है। प्रत्येक यज्ञ के अंत में वैश्रवण राजाधिराज कुबेर को पुष्पांजलि दी जानी चाहिए।

धूमावती

                इसी को अलक्ष्मी माना गया है। यदि धूमावती प्रसन्न न हो तो लक्ष्मी संचय नहीं हो सकता। किसी भी अनुष्ठान में संकल्प के समय लक्ष्मी की प्राप्ति और अलक्ष्मी के निवारणार्थ संकल्प लिया जाता है। दस महाविद्याओं में जितना महत्व कमला का माना गया है उतना ही धूमावती का भी माना गया है। 

चन्द्रमा

                चन्द्रमा अमृत मंथन के समय समुद्र से निकले थे। वे लक्ष्मी के भाई माने गए हैं और उन्हें चंदा मामा इसीलिए कहा जाता है। चन्द्रमा औषधियों के देवता हैं। सूर्य वंश और चंद्र वंश दो प्रमुख राजवंश भारत में चले हैं। लक्ष्मी सूर्य वंश में पत्नी रूप में आती रही हैं और चंद्र वंश में कृष्ण भगवान ने जन्म लिया है। क्योंकि चन्द्रमा समस्त वनस्पतियों के पोषक और अधिदेवता हैं, अत: लक्ष्मी प्राप्ति के अनुष्ठान में चंद्रमा का विशेष महत्त्व है। यज्ञादि कर्म में कुछ विशिष्ट वनस्पतियां धन की सृष्टि करती हैं, ऐसा माना गया है।

विश्वकर्मा व वास्तु देवता

                प्रभास वसु की पत्नी योगासिद्धा से विश्वकर्मा का जन्म हुआ। लंका की स्वर्णपुरी, द्वारकाधाम एवं जगन्नाथ का श्री विग्रह इन्होंने ही निर्मित किया। इनका नाम त्वष्टा भी है। सूर्य पत्नी संज्ञा विश्वकर्मा की पुत्री है, जिनके पुत्र विश्वरूप और वृत हुए। विश्वकर्मा और वास्तु देवता का आह्वान यज्ञों में किया जाता है। यदि लक्ष्मी की साधना करनी है तो वह किस रूप में स्थिर रहेंगी, इसके लिए विश्वकर्मा और वास्तु देवता इस रूप में मदद करते हैं कि अचल संपत्तियां किस रूप में अर्जित रहेंगी।

                लक्ष्मी साधन के लिए जितनी भी पद्धतियों का आविष्कार किया गया है, उन सबका कुल उद्देश्य प्रकृति के किसी न किसी एक साधन को जातक के हित में नियोजन करना है। 18 विद्याएं, 7 सिद्धांत, 300 शास्त्र, 70 महातंत्र इन सबका प्रयोग लक्ष्मी के किसी न किसी स्वरूप को साधने में किया जाता है।यदि किसी भी एक विषय में व्यक्ति विशेषज्ञ हो जाए तो लक्ष्मी साधन में मदद मिलती है। भारतीय शास्त्र एक बात पर एकमत हैं, वे विद्याओं के प्रयोग से विधि-विधान को अपनाकर आध्यात्मिक या लौकिक साधनाओं की ओर प्रवृत्त करते हैं। लक्ष्मी साधन के लिए जिन प्रेरणाओं की आवश्यकता है, वे हमें ज्योतिष के माध्यम से प्राप्त होती हैं। ग्रह-नक्षत्र जातक में उन प्रवृत्तियों को जन्म देते हैं कि वे किस रूप में लक्ष्मी साधन करेंगे। लक्ष्मी साधन के लिए आवश्यक योग्यता उनमें हैं या नहीं?

अलक्ष्मी

                ज्योतिष में अलक्ष्मी किस रूप में जानी जा सकती है? यदि अष्टमेश द्वितीय भाव में बैठ जाएं, अष्टमेश एकादश भाव में बैठ जाएं, धनेश या लाभेश अष्टम भाव में बैठ जाएं, अष्टमेश भाग्य स्थान में बैठ जाएं, लग्नेश, धनेश, लाभेश या भाग्येश अस्त हो जाएं। पंचम भाव किसी भी कारण से बलहीन हो जाए या धन प्रदान करने वाला कोई भी ग्रह पापाक्रांत हो, पाकर्तरि में हो, अस्तंगत हो, पापवर्गों में चला गया हो, षड्बल या षोडश वर्गों में बलहीन हो गया हो तो जातक में अलक्ष्मी को आमंत्रित करने वाले दुर्गुण उत्पन्न होने लगते हैं। अलक्ष्मी से बचना है तो सद्गुणों को बढ़ाने का प्रयास करना होगा। हमें इस बात को समझना होगा कि सद्गुण ही लक्ष्मी हैं।

सत्, तम, रज समन्वय

सत्वादि गुण

                महर्षि पाराशर ने सत्वादि गुण फलाध्याय में उन स्थितियों का वर्णन किया है जब प्राणी में सद्गुणों का प्राधान्य होता है। रजोगुणी और तामसी वृत्ति वाले मनुष्यों से सद्गुण वाले मनुष्य उत्तम माने गए हैं। गुण साम्य वाला व्यक्ति भी सफल होता देखा गया है, परंतु ऋषियों ने सत्, रज और तम के आधार पर उत्तम, मध्यम, अधम और उदासीन व्यक्तित्व माने हैं।

                नारद ने इन्द्रिय और मन का संयम, तपस्या, शौच, क्षमा, सरलता, सत्यवादिता और अलोभ, ये गुण सत्वकारक माने हैं। ये गुण उत्तम पुरुषों के कहे गए हैं।

                शूरता, प्रताप, धैर्य, चातुर्य, युद्धक्षेत्र में पीछे नहीं हटना और साधुओं की रक्षा करना, ये मध्यम पुरुषों के गुण माने गए हैं और इनमें रजोगुणों का आधिक्य है।

                लोभ, मिथ्याचार, मूर्खता, आलस्य और सेवाकार्य में पटुता, ये गुण अधम पुरुषों के माने गए हैं।

                कृषि कार्य, वाणिज्य, पशुओं की रक्षा में पटुता, सत्य व असत्य बोलना, उदासीन पुरुषों के लक्षण माने गए हैं।

                महर्षि पारशर ने मैत्रेय को उपदेश किया है कि जैसा व्यक्ति हो उसको उसी के अनुरूप कार्य देना चाहिए।

                यदि इन तीन सत्व, रज और तम में से एक गुण शेष दो गुणों से भारी पड़े तो मनुष्य को वैसा ही माना जाना चाहिए। यदि कोई भी गुण अत्यंत प्रभावी नहीं हो तो उसे गुणसाम्य की स्थिति समझा जाता है।

स्वामी और सेवक संबंध

                स्वामी और सेवक में, स्त्री और पुरुष में यदि समान गुण हों, तभी प्रेम उत्पन्न होता है। यदि अधम का उदासीन, उदासीन का मध्यम और मध्यम का उत्तम यदि आश्रय हो तब भी परस्पर प्रेम होता है।

                यदि वर से कन्या और स्वामी से सेवक गुणों में हीन हो तब भी प्रेम और सुख होता है। परंतु यदि इसका विपरीत हो तो हानि होती है।

                पिता, माता, जन्म का समय और संगति से उत्तम आदि गुणों के हेतु होते हैं और इनमें प्रत्येक उत्तरोत्तर बलवान होता है। जातक में पिता, माता तथा जन्मकाल प्रदत्त ये तीनों ही गुण जन्मजात होते हैं। इसके पश्चात् जिस तरह की संगति होती है उस तरह के गुण भी विकसित होते हैं। यहां यह कहने का तात्पर्य है कि संगत सबसे अधिक प्रभाव डालने वाली सिद्ध हो सकती है।

                पाराशर किसी मत विशेष से प्रभावित लगते हैं इसीलिए वे बार-बार भगवान की त्रिगुणात्मक शक्ति का आख्यान करते हैं। इसे ही प्रकृति कहा जाता है। इन शक्तियों के वशीभूत ही प्रकृति व्यक्त होती है। व्यक्त रूप में ही काल विशेष में किसी शक्ति प्राचुर्य के वशीभूत उक्त प्रकृति के जातक उत्पन्न होते हैं। सत्व, रज और तम तथा इनसे चतुर्थ उदासीन जातक की उत्पत्ति के समान समस्त प्रकृति भी इन चार गुणों में विभाजित होती है। शब्दांतर से यह भी कहा जा सकता है कि यह जातक नहीं बल्कि काल का गुण है। किसी काल विशेष में इनमें से किसी न किसी गुण का प्राचुर्य होता है और तद्नुरुप ही प्रकृति अपने आपको उस काल के जीवों में अभिव्यक्त करती है।

                यह कथन इस बात के बहुत नजदीक है कि जन्म लग्न स्त्री या पुरुष न होकर किसी कालखंड पर निर्णय है और उस समय उस कालखंड में जिस तत्त्व का आधिक्य होगा या जिस तत्त्व की कमी होगी जन्मपत्रिका से उसे ज्ञात किया जा सकता है। यदि किसी जन्मपत्रिका का अनंत इतिहास ज्ञात किया जा सके तो उसके माध्यम से हम विभिन्न कालखंडों में किस गुण का आधिक्य या कमी रही होगी इसे भी ज्ञात किया जा सकता है।

                एक प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है कि क्या एक ही आत्मा का अंश बार-बार योनि बदलकर प्रवाहित होता रहता है। क्या यह भी संभव है कि आत्मा के किसी अंश विशेष में कितने जन्म लिए गये इसे ज्ञात किया जा सके?

                निश्चित ही ज्योतिष में इन सब बातों का समाधान है। इसीलिए तो करोड़ों लोग हजारों वर्षों से इसे मानते आए हैं। शरीर लक्षण विज्ञान, भूत और भविष्य का ज्ञान तथा कर्मों के फलन की प्रकृति, ये सब एक ही सिक्के के कई पहलू हैं।

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