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देश

उग्र मंगल व देश में अशांति पं. सतीश शर्मा,  एस्ट्रो साइंस एडिटर, नेशनल दुनिया

उग्र मंगल व देश में अशांति

पं. सतीश शर्मा,  एस्ट्रो साइंस एडिटर, नेशनल दुनिया

इन दिनों जो देश में चल रहा है उसका ज्योतिष से घनिष्ठ सम्बन्ध है। ग्रहों की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं होता। जब सारे ग्रह शांत हो गये हैं तो इन दिनों मंगल ग्रह वक्री हो गये हैं और मेष राशि से मीन राशि में आ गये है, जो कि युद्ध, रक्तपात, झगड़े, विवाद, दो राजा या दो शासनाध्यक्षों में युद्ध, विद्रोह, वर्ग युद्ध, सार्वजनिक हिंसा और मृत्यु का तांडव दे रहे हैं। जब मंगल वक्र गति से चलते हैं, जो कि इन दिनों चल रहे हैं, तो अति शक्तिशाली होते हैं और शासनाध्यक्ष या सेनापति को प्रभावित करते हैं। जिन लोगों की जन्म पत्रिका मंगल से प्रभावित हैं उन लोगों के जीवन में इन दिनों महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटने की संभावना है।

हमारे सूर्य से मंगल की औसत दूरी 23 करोड़ किमी. है। मंगल का दिन पृथ्वी के दिन से कुछ मिनट ही अधिक है। पृथ्वी की तरह ही मंगल का अपने अक्ष पर झुकाव 25.19 डिग्री है अर्थात् मंगल को ग्लोब के रूप में दिखाया जाए तो पृथ्वी के ग्लोब की तरह ही झुका हुआ दिखाया जाएगा। ऋतुएँ भी बिल्कुल पृथ्वी जैसी ही हैं परन्तु उनकी अवधि लगभग दुगुनी है। इस समय मंगल और पृथ्वी के बीच में सबसे कम दूरी है, जो कि अगले 25 हजार वर्ष तक चलेगी।

देवता के रूप में मंगल के हाथों में चार शस्त्र हैं - त्रिशूल, गदा, कमल तथा एक शूल। वराह पुराण के वर्णन के अनुसार वे भगवान वराह अवतार और पृथ्वी के मिलन से उत्पन्न हुए हैं। यह तब की कथा है जब सारी पृथ्वी जल में डूब गई थी और भगवान ने वराह (शूकर) के रूप में अवतार लेकर अपने थूथन से पृथ्वी को जल से बाहर निकालकर उसका उद्धार किया था। पृथ्वी और वराह के मिलन से मंगल की उत्पत्ति हुई, इसलिए मंगल को भौम या भूमि पुत्र माना जाता है। परन्तु मंगल का स्वयं का विवाह नहीं हुआ था। इस घटना का समीकरण किसी खगोलीय घटना के साथ किया जा सकता है, जिसमें किसी बड़े खगोलीय पिण्ड ने पृथ्वी को टक्कर मार दी और पृथ्वी से एक टुकड़ा निकलकर मंगल ग्रह के रूप में निर्मित हो गया। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इसीलिए पृथ्वी और मंगल के गुणों में बहुत अधिक समानता है और अगर कहीं जीवन हुआ, तो पृथ्वी के अतिरिक्त मंगल ग्रह पर ही सबसे ज्यादा संभावना है।

वैज्ञानिकों का एक समूह इस बुद्धि विलास में पड़ा हुआ है कि जीवन की उत्पत्ति के लिए कोई प्रथम सूक्ष्म जीव या तो पृथ्वी वाले भाग में था या मंगल वाले भाग में था। कभी यह बहुत गर्म ग्रह था परन्तु अब तप्त लाल ग्रह में बदल गया है। परन्तु मंगल पर अब वह सब कुछ है जो पृथ्वी पर है। बल्कि हमारे सम्पूर्ण सौर मण्डल का सबसे ऊँचा पर्वत भी मंगल पर ही स्थित है। उसका नाम ओलम्पस मून्स है। अन्य वैज्ञानिक शोध भी यह बताते हैं कि 3 ग्रह और भी ऐसे हैं जिन पर जीवन की सम्भावनाएँ हैं। नेचर जनरल में प्रकाशित एक शोध के अनुसार यह तीन ग्रह आकार में पृथ्वी और शुक्र जैसे हैं और पृथ्वी से 39 प्रकाश वर्ष दूर हैं।

ज्योतिष में मंगल –

मंगल देवताओं के सेनापति हैं, इनका समीकरण भगवान शिव के पुत्र स्कन्द या कार्तिकेय से भी किया जाता है तथा त्रेता युग के हनुमान जी और द्वापर युग में भीम के अंदर मंगल का अंश माना जाता है।

मनुष्य शरीर में मंगल -

मनुष्य के शरीर में मंगल का आधिपत्य रक्त पर माना जाता है। रक्त निर्माण, रक्त प्रवाह से मंगल का सम्बन्ध होता है। शरीर में जितने भी रक्त विकार होते हैं, वे मंगल के नीच राशि में होने से, अस्त होने से और वक्री होने से सम्भव होते हैं। रक्ताल्पता हो, रक्त चाप हो, खून का पतला या गाढ़ा होना हो, थ्रोम्बोसिस या डीवीटी जैसी बीमारी जिसमें रक्त के थक्के बनकर नालियों को अवरूद्ध कर देते हैं, इत्यादि दूषित मंगल के कारण होते हैं। पल्स रेट या हार्ट बीट का कम-ज्यादा होना भी मंगल पर निर्भर है। वर्जिश, व्यायाम, खेलकूद, मॉर्निंग वॉक, कुश्ती और मुष्टियुद्ध सब मंगल के विषय हैं। आप अच्छी सी मॉर्निंग वॉक करिए, आपका रक्त चाप बढ़ता हुआ नजर आएगा। आप थोड़ा सा गुस्सा कीजिए तो आपका चेहरा लाल हो जाएगा या आपकी भृकुटि तन जाएगी, या आँखों में लाल डोरे आ जाएंगे तो मंगल चेहरे पर नजर आने लगेंगे। आपके शरीर पर घाव लगा है तो मंगल के कारण है। पहले तलवार, तीर-कमान से युद्ध हुआ करते थे तो शरीर पर घाव आ जाते थे, वह दूषित मंगल के कारण आते थे। आजकल बाहरी घाव नहीं होते, परन्तु मंगल दूषित होने के कारण पित्त जनित अल्सर या आंतरिक व्रण मंगल के कारण होते हैं।

दाम्पत्य जीवन में मंगल -

जन्म पत्रिका के 12वें भाव, लग्न, चौथे भाव, सातवें भाव और आठवें भाव में यदि मंगल स्थित हों तो उसे मंगल दोष माना जाता हैं। इस दोष का वास्तविक नाम तो वैधव्य दोष है, क्योंकि इन स्थानों में बैठा हुआ मंगल जीवन साथी के आयु और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। जीवन साथी की जन्म पत्रिका के इन्हीं भावों में यदि मंगल हो तो मंगल दोष का उपाय मान लिया जाता है। उच्च राशि का मंगल यद्यपि शुभ माना गया है और पंच महापुरुष योगों में से एक महायोग बनाता है, जिसका नाम रुचक महायोग है। परन्तु इस योग वाले बड़बोले और झूठ बोलते भी देखे गये हैं। पौरूष व अधिकारिता का सम्बन्ध मंगल से जोड़ा गया है। मंगल प्रधान व्यक्ति घर और चाहे बाहर, खुद ही शासन करना चाहते हैं।

कर्ज मुक्ति और मंगल -

कर्ज का सम्बन्ध मंगल से जोड़ा गया है, इसलिए कर्जमुक्ति के जो उपाय किये जाते हैं, उनमें मंगल ग्रह के पूजा - पाठ बताये जाते हैं। वे ही खिलाड़ी सफल होते हैं, जिनकी कुण्डली में मंगल शानदार होते हैं। मंगल प्रधान व्यक्ति अत्यंत श्रमशील होते हैं, अत: धीरे-धीरे कर्जमुक्त हो ही जाते हैं।

तर्क के देवता हैं मंगल -

जैमिनी ऋषि ने मंगल को तर्कशास्त्र का प्रणेता ग्रह माना है। कारकांश लग्न में यदि मंगल हो तो व्यक्ति तार्किक होता है, चाहे वह न्यायाधीश हो, चाहे वकील हो, चाहे कम्पनियों के पैरोकार हों, चाहे लीगल एडवाइजर हों या चाहे मेडिकल रिप्रेन्टेटिव जैसे कर्मचारी हों। मंगल और बुध ग्रह का परस्पर ज्योतिष सम्बन्ध हो व्यक्ति निश्चित न्यायाधीश बनता है।

वर्तमान सामाजिक अशांति और मंगल ग्रह -

हाथरस जैसी घटना या ऐसी अनेकों घटनाओं के मूल में जहाँ सामाजिक मतभेद या वर्ग भेद जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, मंगल ग्रह की गतियाँ देशकाल को प्रभावित करती हैं। सितम्बर महीने से मंगल मेष राशि में आये हैं जो कि उनकी अपनी राशि है, फिर वे वक्री हो गये तो और भी शक्तिशाली हो गये। इसके बाद एक विचित्र बात हुई कि 4 अक्टूबर के दिन मंगल ग्रह मेष राशि से उल्टा चलकर मीन राशि में आ गये यानि कि करेला और नीमचढ़ा। प्रभावित वर्ग कौन हैं? राजपूत, जो कि मंगल ग्रह के प्रतिनिधि हैं। अत: शास्त्रों में वर्णित ग्रहों का प्रभाव सामाजिक जीवन में इस प्रकार देखा जा सकता है। अब यह मंगल 14 नवम्बर तक वक्री रहेंगे, तो एक भविष्यवाणी की जा सकती है कि 14 नवम्बर तक किसी न किसी रूप में आंदोलन चलते ही रहेंगे। झूठे तर्क गढ़े जाएंगे, षडय़ंत्र रच जाएंगे और सरकारें अपराधियों के पीछे भागती रहेंगी। मंगल के कारण लोगों के दिमाग में गर्मी भरी रहेगी और घटनाएँ घटती रहेंगी। राजशाहियों के जमाने में तो राजा लोग खुद ग्रहों की शान्ति करवा लेते थे। वर्तमान लोकतांत्रिक पद्धतियों में सरकारें तो ऐसा काम करती नहीं है। हाँ, व्यक्तिगत स्तर पर किये जा सकते हैं। अभी मंगल की बड़ी भूमिका शेष हैं क्योंकि थोड़े दिन बाद वे पुन: मेष राशि में 24 दिसम्बर को आने वाले हैं, जहाँ वे 22 फरवरी तक रहेंगे और उसके बाद वृषभ राशि में 14 अप्रैल तक रहेंगे। मंगल ग्रह के मीन, मेष और वृषभ राशि पर्यन्त भ्रमण के समय शासन के हाथ अपराधियों की गर्दन पर होंगे। चूंकि वृषभ राशि में रहते हुए मंगल, वृश्चिक राशि पर दृष्टिपात करेंगे, जो कि मुम्बई की राशि है, इसीलिए वहाँ पर भी अपराधियों की गर्दन पर कानून के हाथ पहुँच जाएंगे।

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चित्रा नक्षत्र

भारतीय नक्षत्र गणना में चित्रा 14वाँ है। इस नक्षत्र के आधे भाग को कन्या राशि में लिया गया है और आधे भाग को तुला में। चित्रा नक्षत्र के स्वामी ग्रह मंगल माने गये हैं। नक्षत्र के देवता त्वष्टा हैं, जिनकी गणना द्वादश आदित्यों में की गई है। अंग्रेजी में इस नक्षत्र को स्पाइका या अल्फा-वर्जिनिस कहते हैं। नंगी आँखों से देखे जाने वाले सबसे चमकदार तारों में इसकी गणना होती है। यह अग्नि तत्त्व के हैं। तामसिक गुण हैं, पित्त प्रधान हैं और इनकी बीज ध्वनि पे, पो, रा, री है। अर्थात् पहले चरण का नामाक्षर पे पर रखा जाता है। नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्मे व्यक्ति का नाम पो पर रखा जा सकता है। तीसरा चरण जो कि तुला राशि में पड़ता है, में जन्मे व्यक्ति का नाम रा पर रखा जा सकता है और चित्रा नक्षत्र के चौथे और आखिरी चरण में जन्मे व्यक्ति का नाम री अक्षर पर रखा जा सकता है।

इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति अत्यंत आकर्षक व्यक्ति के स्वामी होते हैं, ऊर्जावान, कलाकार, महान प्रेमी, शूरवीर, ज्ञानी, विवेकी, बहुत सारे गुणों से युक्त, साफ-सुथरा रहने वाले व जन्म स्थान से कहीं दूर उन्नति पाने वाले होते हंै। यह लोग अत्यंत प्रतिभाशाली होते हैं, आत्म विश्वास से परिपूर्ण होते हैं। जीवन में जोखिम लेते हैं। कभी -कभी बहुत प्रतिक्रियावादी होते हैं और जीवन में कई बार लीक से हटकर काम करते हैं। यह लोग कलाओं में कुशल, सौन्दर्यशास्त्र में कुशल, चिकित्सा का कार्य करने वाले, वाणी का उपयोग करने वाले, योजनाएँ बनाने वाले व प्रतिभा से प्रदर्शन करने वाले हो सकते हैं। इनकी मुख्य समस्या यह है कि एक से अधिक गतिविधियों में जुड़े रहते हैं, इसीलिए एकाग्रता बनाये रखने के लिए विशेष प्रयास करने पड़ते हैं।

भारतीय ज्योतिष चित्रापक्षीय अयनांश पर आधारित है अर्थात् सूर्य का अपनी मूल कक्षा से जो विचलन हो रहा है उसकी गणना के लिए या सूर्य की वास्तविक स्थिति के ज्ञान के लिए चित्रा नक्षत्र को उपयोग में लाया जाता है। वैसे तो सूर्य को नग्न आँखों से देखा जाना संभव नहीं है, इसीलिए पुराने ऋषियों से एक विधि निकाली। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र पर होते हैं। जब वे चित्रा नक्षत्र के ठीक मध्य में स्थित होकर तुला राशि में प्रवेश करने वाले होते है, ठीक उसी समय उनसे 180 अंश पर सूर्य की स्थिति होती है, जो कि मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश लेने को तत्पर होते हैं। इससे सूर्य की गति और स्थिति का पता लगाया जाता है। इस गणना पद्धति को ही विस्तार दिया जाकर सूर्य की गति का और ज्योतिष की गणनाओं का प्रयोग किया जाता है। चूँकि चित्रा नक्षत्र गणना का आधार बिन्दु है, इसलिए अयनांश गणना पद्धति चित्रा पक्षीय कहलाती है जो कि भारतीय ज्योतिष की विशेषता है। इसे भारत सरकार ने भी स्वीकार कर लिया है। आकाश में इन्हें पहचानने के लिए पहले तो सप्तऋषि मण्डल को पहचाना जाता है और उनके सम्मुख ही चित्रा नक्षत्र की पहचान की जा सकती है।

चित्रा नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति सुन्दर होते हैं, सौन्दर्य प्रेमी होते हैं, इन्हें सजना-संवरना अच्छा लगता है और 33 से 38 वर्ष की आयु में इनका भाग्योदय होता है। जब चित्रा नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति का जन्म कन्या राशि में होता है तब ये जोखिम लेने वाले और पराक्रमी होते हैं और जब चित्रा नक्षत्र के बाद के 2 चरणों में जन्म होता है, जो कि तुला राशि के अन्तर्गत होते हैं, तो वे अत्यंत आकर्षक व कामुक होते हैं।

मंगलवार के दिन 7 प्रकार के अनाज का दान तथा गुड़ व तिल का दान लाभकारी रहता है। इस नक्षत्र के लिए जब यज्ञ किया जाता है तो वैदिक मंत्र के साथ यज्ञ समिधा में तिल और घी के साथ-साथ पान के पत्ते की आहुति भी दी जाती है। वैदिक मंत्र विश्वकर्मा से सम्बन्धित है जो इस प्रकार है-

ॐ त्वष्टा तुरीयो अद्भुत इन्द्राग्री पुष्टिवद्र्धनम्।

द्विपदाछन्द ऽइन्द्रियमुक्षा गौत्रवयोदध: ॐ विश्वकम्र्मणे नम:।।

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दो ब्लैक होल की टक्कर

ब्लैक होल या तो किसी बहुत बड़े तारे के विस्फोट से बनता है, जिसमें विस्फोट के बाद वह इतना सिकुड़ जाता है कि शून्य जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। सृष्टि जब अपने को समेटने लगती है तो ब्लैक होल जैसी स्थितियाँ पैदा होती हैं। यह महाशून्य में पहुँचने से पहले की स्थिति है। इनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति इतनी अधिक हो जाती है कि सूर्य का प्रकाश भी यदि अन्दर चला जाए तो बाहर नहीं आ सकता।

प्रस्तुत घटना का पता 21 मई 2019 को लगा जब एक बहुत तेज अंतरिक्ष कंपन को रिकॉर्ड किया गया जिसकी अवधि 1 सैकण्ड के 10वें हिस्से जितनी थी। इसका मापन लेजर इन्टरफेरो मीटर के द्वारा फ्राँस की एक प्रयोगशाला में किया गया। 2 विशाल ब्लैक होल की टक्कर से उत्पन्न सिग्रल 7 अरब प्रकाश वर्ष बाद पृथ्वी पर पहुंचे। इस टक्कर से हमारे जैसे आठ सूर्यों के बराबर ऊर्जा निकली और दोनों ब्लैक होल के विलय के कारण जो बड़ा ब्लैक होल बना, उसका द्रव्यमान हमारे सूरज से 142 गुना ज्यादा बड़ा था।

अमेरिका और यूरोप के सहयोग से एक सुपर सेंसिटिव ग्रेविटेशनल वेव डिटेक्शन प्रणाली के माध्यम इन तरंगों का पता लगाया जाता है।

कुछ ब्लैक होल इतने बड़े हैं जिनका द्रव्यमान हमारे सूरज से अरबों गुना बड़ा है। जब 2 ब्लैक होल आपस में टकराते हैं तो गुरुत्वाकर्षण तरंगे पैदा करते हैं। वर्तमान घटना वाले ब्लैक होल की टक्कर की दूरी 150 अरब लाख करोड़ किमी. के बराबर मानी गई है।

नक्षत्रों के अंदर का जब ईंधन समाप्त हो जाता है तो उनके अन्दर विस्फोट होता है तो ब्लैक होल बन जाते हैं। वे बहुत संकुचित हो जाते हैं। वैज्ञानिकों की यह खोज हमारे उपनिषदों के द्वारा बताई गई बातों के अनुरूप ही है।

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पुखराज

बृहस्पति ग्रह के लिए पुखराज का प्रस्ताव किया जाता है। इसे संस्कृत में पुष्पराग कहा जाता है। शास्त्रों  में बृहस्पति का रंग पीला बताया गया है और बृहस्पति की रश्मियों को अधिक प्राप्त करने के लिए पुखराज का रत्न पहना जाता है। इसको परखने के लिए कई तरीके हैं, जिनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय तरीका पुखराज रत्न को 24 घण्टे तक दूध में रखा जाता है। यदि चमक बनी रहे तो वह पुखराज अच्छा कहलाता है।

पुखराज रत्न की रासायनिक संरचना में एल्युमिनियम सिलिकेट होता है तथा फ्लोरीन भी होती है। यद्यपि बृहस्पति का रंग पीला है परन्तु पुखराज कई रंगों में मिलते हैं जिनमें नीला, भूरा, स्लेटी  रंग का, हरा, हल्का लाल या गुलाबी व पीला शामिल है। इसका रिफ्रेक्टिव इंडेक्स हीरे और नीलम से कम होता है तथा काफी उपयोग के बाद कई बार चटक भी जाता है।

उपरत्न - सबसे ज्यादा लोकप्रिय सुनहला या सीट्रिन होता है जो कि सस्ता होता है परन्तु बहुत सुन्दर होता है। ज्योतिषी लोग आमतौर से टाइगर, पीला हकीक, सोनल, केरू या केसरी भी उपरत्न के रूप में बता देते हैं। सीट्रिन और असली पुखराज की कीमतों में बहुत अधिक अंतर होता है। इसीलिए यह रत्न जानकार की मदद से खरीदने चाहिए। अगर पुखराज पीले रंग का है तभी बृहस्पति के लिए ज्यादा अच्छा काम करेगा।

उपलब्धि - ब्राजील, रूस, श्रीलंका, अफगानिस्तान, नार्वे और इटली में पुखराज पाया जाता है। ब्राजील का पुखराज अच्छा माना जाता है। अच्छा रत्न लगभग पारदर्शी होता है और इसकी पारदर्शिता से ही कीमत तय होती है।

कैसे धारण करें- बृहस्पतिवार को सूर्योदय होने से एक घण्टे होने के अन्दर-अन्दर बृहस्पति की होरा होती है, उसमें पुखराज को धारण करना चाहिए। सोने की अँगूठी में पुखराज को तर्जनी में धारण करना करना चाहिए। परन्तु पुखराज चाँदी या पंचधातु में भी धारण किया जा सकता है। मेष लग्न, कर्क लग्न, सिंह लग्न, वृश्चिक लग्न, धनु लग्न व मीन लग्न वालों को पुखराज धारण करना अच्छा रहता है, परन्तु मिथुन लग्न वाले भी आवश्यकता पडऩे पर पुखराज धारण कर सकते हैं। वृषभ, तुला, मकर और कुम्भ लग्न वालों को पुखराज धारण नहीं करना चाहिए।

जिन लोगों को बृहस्पति को बलवान करना हो, उन्हें पुखराज धारण कराया जाना चाहिए, परन्तु जिनकी कुण्डली में बृहस्पति अशुभ रूप में उपस्थित हों, उन्हें पुखराज धारण नहीं करना चाहिए।

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मृत्यु के देवता प्लूटो

प्लूटो का समीकरण भारतीय ज्योतिष में यम से किया गया है। हमारे सौर मण्डल का सबसे बाहरी खगोलीय पिण्ड हमारे चन्द्रमा से भी एक तिहाई है। एकदम अनियमित कक्षा वाले प्लूटो का भ्रमण बहुत ही अजीब है। कभी तो 4.4 अरब किमी. दूर, तो कभी सूर्य से 7.4 अरब किमी. दूरी पर पहुँच जाता है। 248 वर्ष में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है।

भारतीय ज्योतिष में प्लूटो को लेकर बहुत कुछ नहीं कहा गया है। नवग्रह मण्डल प्रतिष्ठा में प्लूटो को शामिल नहीं किया गया और ना उनके आह्वान के मंत्र गढ़े गये। सम्भवत: भारतीय ऋषियों को प्लूटो की उस गति का ज्ञान था, जो कि अन्य ग्रहों से एकदम अलग है। मेदिनी ज्योतिष के अन्तर्गत हर्षल और नेपच्यून का तो खुलकर प्रयोग किया गया है परन्तु प्लूटो का उल्लेख ना के बराबर है। परन्तु ऋषियों को प्लूटो का ज्ञान जरूर था और उन्होंने एक अन्य महत्त्वपूर्ण वास्तु चक्र में प्लूटो को स्थान दे दिया। दक्षिण दिशा मध्य में यम को एक पद दिया गया है। यमराज के बारे में तो आप जानते ही हैं। वास्तु चक्र से बाहर दक्षिण दिशा में अर्यमा को भी स्थान दिया गया है जो कि प्रेतों के अधिपति हैं।

प्लूटो का सम्बन्ध मेदिनी ज्योतिष में तकनीकी ज्ञान, आणविक ऊर्जा, तमाम तरह के रहस्य और जासूसी और अंतरिक्ष की शक्तियों और रश्मियों का ज्ञान कराने वाला माना जाता है। मनुष्य के शरीर में प्लूटो को अतीन्द्रिय शक्तियों का स्वामी माना जाता है। बहुत अधिक नाइट्रोजन, पानी और उसकी बर्फ से बना है प्लूटो। प्लूटो का एक दिन पृथ्वी के साढ़े 6 दिन के बराबर है।

इस वर्ष 31 दिसम्बर के दिन प्लूटो धनु से मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ पर गुरु और शनि पहले से ही इक_ा बैठे हैं। प्लूटो इस राशि में 6 मार्च 2039 तक रहेंगे और भारत के सर्वांगीण उन्नति के कारक बनेंगे। चूँकि भारत की मेदिनी ज्योतिष में प्रभावित राशि मकर मानी जाती है और इस समय भारत की वृषभ लग्न की जन्म पत्रिका में प्लूटो भाग्य भाव में स्थित हैं इसीलिए आने वाले वर्षों में भारत अद्भुत तकनीकी प्रगति करेगा। जिस समय प्लूटो मकर राशि में प्रवेश करेंगे अर्थात् 2020 के आखिरी दिन, उस दिन बृहस्पति, शनि और प्लूटो की युति से केन्द्रीय प्रभाव में मंगल और यूरेनस भी रहेंगे, जो कि भारत में कई मामलों को लेकर उथल - पुथल कराएंगे। राजनैतिक दलों के परस्पर संघर्ष पराकाष्ठा पर होंगे। धु्रवीकरण की गति बहुत तेज हो जाएगी।

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