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देश

घाटा, कर्जा, दीवाला : ढूँढें वास्तुशास्त्र से पं. सतीश शर्मा, एस्ट्रो एडिटर एस्ट्रो साइंस एडिटर, नेशनल दुनिया

बात सन् 1998 की है। चैम्बर ऑफ कॉमर्स आबू रोड़ के कहने पर वहाँ के औद्योगिक क्षेत्र का सर्वे किया तो कुछ तथ्य ऐसे आए जो चौकाने वाले थे। खूब मेहनत करने के बाद भी 300 में से 280 उद्योग या कारखाने घाटे में चल रहे थे या बंद हो गये थे। जो बात पहले दिन मेरे वास्तु शो में सिद्धान्त रूप में बताई गई थी, वह अगले ही दिन व्यवहार में सत्य पाई गई। मेरा निष्कर्ष था कि देशान्तर रेखाओं से या अक्षांश रेखाओं से बहुत अधिक कोण बनाते हुए औद्योगिक भूखण्ड आवंटित किये गये थे, इसीलिए उनके शेड की दीवारें भी देशान्तर रेखाओं व अक्षांश रेखाओं के समानान्तर नहीं थी,

बल्कि कोण बनाकर निर्माण की गई थीं। ऐसे भूखण्ड या उद्योग असफल हो जाते हैं, क्यों कि ऐसे भूखण्डों को वास्तुशास्त्र में दिग्मूढ़ माना गया है। देश का साधारण मिस्त्री ऐसे भूखण्डों को बदगुनिया कहते हैं। ऐसे भूखण्डों में कोणों के अतिरिक्त विस्तार उत्पन्न हो जाते हैं। गुनिया, एल आकार का एक धातु यंत्र होता है, जिससे दीवारों को एक-दूसरे से समकोण पर रखने में मदद मिलती है। शास्त्र कहता है कि जब भूखण्ड के कोणों का अतिरिक्त विस्तार होता है तो वे अशुभ हो जाते हैं।

थोड़े ही दिनों में मुझे अलवर शहर के चैम्बर ऑफ कॉमर्स के निमंत्रण पर अलवर शहर जाना पड़ा और मेरे द्वारा दिये गये वास्तु कार्यक्रम के अगले दिन मत्स्य औद्योगिक क्षेत्र के सर्वेक्षण की बात आ गई और चैम्बर के अध्यक्ष मेजर ओ.पी. यादव भी यह चाहते थे कि एक ऐसी रिपोर्ट तैयार की जाए, जिसके आधार पर राज्य सरकार को प्रभावित किया जा सके।

अलवर के औद्योगिक क्षेत्रों में बहुत सारे उद्योग असफल चल रहे थे। वहाँ दूसरे तथ्य नजर में आए। वह यह कि जिन-जिन उद्योगों के मुख्य द्वार वायव्य कोण में थे या जिन उद्योगों का वायव्य कोण वास्तुशास्त्र के हिसाब से बिगड़ा हुआ था, चाहे निर्माण के द्वारा या अन्य तरीकों से, वहाँ-वहाँ घाटा, दीवाला, कर्जा, कानूनी कार्यवाहियाँ और सरकारी संस्थाओं से विवाद देखने में आए। मैंने लगभग हर फैक्ट्री में वास्तुशास्त्र के नियमों का परीक्षण किया, बल्कि हजारों वर्ष पूर्व बने हुए नियमों को अभी तक सत्य पाया। जिस दिशा के जो परिणाम शास्त्रों में बताये गये, मौके पर मुझे वह ही देखने को मिले। वह उद्योग चाहे सारे भारत में प्रसिद्ध हो और चाहे कोई छोटे दर्जे का उद्योग हो, वास्तुशास्त्र के नियम समान रूप से लागू होते पाये गये।

 

पश्चिम दिशा मध्य से वायव्य कोण के बीच में 4-5 द्वार आते हैं जिनका शास्त्रों में विशद वर्णन है और केवल बाहरी बाउण्ड्री के द्वारा ही यह परिणाम दे जाते हैं। मकान या कारखाने में पश्चिम दिशा से अन्दर प्रवेश करते समय तुरन्त बाईं ओर असुर नाम के देवता का शासन होता है और वे सरकार से दण्डित करवाते हैं। यह द्वार जिनके पाया जाए, उनके घर में इन्कम टेक्स, सेल्स टेक्स, जी.एस.टी. वाले या नगर पालिका वाले एक न एक दिन जरुर आते हैं। चाहे छापा पड़े या तोड़-फोड़ हो। शोष नाम के देवता धन हानि करवाते हैं। दीवाला, घाटा या कर्जा यहीं से आता है। ऐसा तब होता है जब या तो बिक्री कम हो जाए या स्टॉफ बहुत बढ़ जाये या निर्माण लागत बहुत बढ़ जाए या धन का अपव्यय हो। पापयक्ष्मा नाम के देवता के स्थान पर यदि द्वार हो तो घर में सदा बीमारी रहती है और लम्बे समय तक बीमार रहते-रहते व्यक्ति असमर्थ हो जाता है। यदि ठीक वायव्य कोण में द्वार हो तो व्यक्ति या तो दुर्घटना में मारा जाता है या जेल जाता है। यह बात घरों पर भी लागू होती है और फैक्ट्री कारखानों पर भी लागू होती है। यदि नाग नाम के देवता के स्थान पर द्वार बना दिया जाए तो उद्योग के खिलाफ षड़यंत्र चलते रहते हैं। नये-नये कानूनी विवाद होते हैं और उद्योग घाटे में चला जाता है।

मकान या कारखाने में प्रवेश करते समय पश्चिम मध्य दिशा से यदि दाहिनीं तरफ द्वार हो तो भी इस तरह की समस्याएँ आ सकती हैं। यदि चित्र में बताये दौवारिक नाम के देवता के स्थान पर द्वार हो तो शत्रु से ही व्यक्ति परेशान रहता है और उन्नति नहीं कर पाता। इसी प्रकार ठीक नैऋत्य कोण अर्थात् दक्षिण-पश्चिम में द्वार हो तो घाटा बढ़ता चला जाता है। सन्तानों की मेहनत बेकार हो जाती है और कोई न कोई मुकदमा पीछे लगा ही रहता है।

वायव्य कोण में बाहरी द्वार ही नहीं बल्कि कारखानों के अन्दर निर्माण कार्य से भी कई प्रकार के दोष उत्पन्न होते हैं। यदि कारखाने का यह भाग घने निर्माण वाला हो और सबसे ऊँचा भाग भी वही हो तो धीरे-धीरे फैक्ट्री पर कर्जा बढ़ने लगता है और मकान मालिक या फैक्ट्री का मालिक फैक्ट्री को बेचने के लिए बाध्य हो जाता है। अगर भूखण्ड का वायव्य कोण अतिरिक्त विस्तार लिये हो या बदगुनिया हो तो ऐसी फैक्टि्रयाँ बार-बार बिकती रहती हैं। उसको कोई भी नहीं चला पाता। कारखाने के वायव्य कोण में स्विमिंग पूल होना या कुआँ होना या गहरा गढ़ा या बेसमेंट होना भी कर्जा बढ़ाने का काम करता है। सरकारी लोग खिलाफ ही रहते हैं। फैक्टि्रयों में मजदूर अधिक दिन नहीं टिकते और यह नित-प्रति की समस्या हो जाती है।

वास्तुशास्त्र में दक्षिण दिशा में कुल मिलाकर आठ द्वारों के प्रस्ताव किये गये हैं, जिनमें से केवल एक ही सफल होता है। वह द्वार फैक्ट्री में घुसते समय ठीक दक्षिण दिशा से दाहिनीं ओर पड़ता है। बाकी सभी द्वारों में किसी से धोखा मिलता है, किसी द्वार से व्यक्ति के सगे-सम्बन्धी ही धोखा करते हैं या कर्मचारी चोरी-चकारी करते हैं और धीरे-धीरे वह फैक्ट्री या तो घाटे में आ जाती है या उसका सामान या भूमि बिकनी शुरु हो जाती है। व्यक्ति समझ ही नहीं पाता कि उसके बहुत निकट के सगे-सम्बन्धी ही घात लगाये बैठै हैं। इसीलिए ऋषियों ने दक्षिण और पश्चिममुखी मकानों को पसन्द नहीं किया था। उनका मानना था कि इन दिशाओं के द्वार असफलता की ओर ले जाते हैं और व्यक्ति दीवालिया या कर्जदार हो सकता है।

ऐसा नहीं है कि पश्चिम दिशा सदा घाटे की ओर ले जाती है। वरुण नाम के देवता और पुष्पदन्त नाम के देवता अपार धन दे सकते हैं और विदेश व्यापार भी करवा सकते हैं। परन्तु इन द्वारों के स्थान का निर्णय व्यक्ति को स्वयं नहीं करना चाहिए। किसी कुशल वास्तुशास्त्री की मदद लेनी ही चाहिए। सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।

फैक्ट्री या घर के निर्माण में पश्चिम दिशा सबसे हल्की, नीची और कम निर्माण वाली हो और उससे अधिक निर्माण या ऊँचाई पूर्व दिशा में है तो ऐसे भूखण्ड को शास्त्रों में दैत्य पृष्ठ कहा गया है। ऐसे निर्माण कार्य से स्त्री, पुत्र और वाहनों का नाश बताया गया है। यदि हमें इस बात का पता चल जाए तो संशोधन अवश्य करवा लेना चाहिए। इससे स्थिति को सुधारा जा सकता है।

जेल योग

जैमिनी ऋषि कहते हैं यदि -1. दूसरे और बारहवें, 2. तीसरे और ग्यारहवें, 3. चौथे और दसवें तथा छठे और बारहवें भाव में यदि तुल्य संख्यक (बराबर संख्या) ग्रह हों तो बंधन योग होता है। यह बंधन न्यायालय की आज्ञा से भी हो सकता है या अपहरण इत्यादि के मामलों में भी माना जा सकता है। इस लेख में दो उदाहरण फिल्मी सितारों के हैं जिनमें जेल योग मौजूद हैं। संजय दत्त के दूसरे और बारहवें भाव में बराबर संख्या में ग्रह उपलब्ध हैं और सलमान खान के तीसरे और ग्याहरवें भाव में बराबर संख्या में ग्रह उपलब्ध हैं।

जैमिनी ऋषि यह भी कहते हैं कि अगर इन भावों में बराबर संख्या में ग्रह नहीं हों तो यह योग भंग हो जाता है और छोटे-मोटे कष्ट देकर निकल जाता है।

 

 

जेल योग आमतौर से तब होता है जब 12वें भाव की दशा-महादशा आती है। परन्तु इसके लिए जरूरी है कि ग्रह स्थितियाँ खराब हों। इनमें चन्द्रमा जिस राशि में हों, उस राशि के दोनों ओर पाप ग्रह स्थित हों, या लग्न के दोनों ओर पापग्रह स्थित हों, या बहुत सारे ग्रह आठवें भाव या छठें भाव में स्थित हों जैसी स्थितियाँ शामिल हैं। जेल योग के बिना अगर थोड़े समय के लिए पुलिस हिरासत और बंधन में रहना पड़ जाये तो वह स्थायी नहीं रहता, क्योंकि जेल में रहने का योग है ही नहीं। अर्थात् ऐसे मामलों में चूंकि न्यायालय का कारावास का आदेश नहीं होता है, मुकद्मा झेलने के बाद भी सजाएँ नहीं होती।  ऐसे लोगों को अगर शासन जबरन बंद करना चाहे तो जनता में तीव्र प्रतिरोध होता है और उल्टा प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। लालकृष्ण आडवाणी की कुण्डली इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। इसीलिए सलामान खान और संजय दत्त की तुलना लालकृष्ण आडवाणी से नहीं की जा सकती और इनकी जन्म पत्रिकाओं में दिन-रात का अंतर है।

राहु और केतु

राहु-केतु वास्तविक ग्रह नहीं है और दो ग्रह की कक्षाओं के कटान बिन्दु हैं। इसे ज्योतिष की भाषा में सम्पात कहते हैं। जो सम्पात उत्तरी खगोल में होता है, उसे राहु कहते हैं। जो सम्पात दक्षिणी खगोल में होता है, उसे केतु कहते हैं। पाश्चात्य ज्योतिष में इनका नाम ड्रेगन्स हेड और ड्रेगन्स टेल कहा गया है। हेड का मतलब सिर और टेल का मतलब पूँछ। परन्तु यह शब्द चीनी ड्रेगन के सन्दर्भ में नहीं लिये गये हैं बल्कि भारतीय पौराणिक साहित्य से लेकर गढ़े गये हैं। ऐसा इसलिए कि राहु-केतु का समीकरण सर्प से किया गया है। ड्रेगन की कल्पना तो एक भयानक सर्प से की गई है। यद्यपि भारत में किसी भी सर्प या नाग को घातक तो बताया गया है परन्तु भयानक नहीं बताया गया है। दूसरा आध्यात्मिक सर्प की सत्ता देवताओं से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं।

ज्योतिष जगत में यह भी विचार है कि जैसे अन्य ग्रहों की दृष्टि होती है, राहु - केतु की भी होती है। अनुभव में आया है कि राहु-केतु की भी दृष्टि होती है, क्योंकि इसके परिणाम देखने को मिले हैं। राहु-केतु अति शक्तिशाली गणितीय बिन्दु हैं, जिनके क्षेत्राधिकार में जाने पर अन्य ग्रह बुरी तरह प्रभावित हो जाते हैं और उनके परिणाम में अन्तर आने लगते हैं। पाश्चात्य वैज्ञानिक चाहे राहु-केतु के नाम की हँसी उड़ाएं परन्तु भारतीय जनजीवन में राहु ने अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थिति प्राप्त कर ली है।

पौराणिक कथन -

मानवों और दैत्यों के बीच में कई विषय अनिर्णीत थे। इसीलिए विष्णु भगवान की समझाइश पर ये दोनों वर्ग समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गये। समुद्र मंथन के लिए बड़ी तैयारियाँ की गई। पर्वतराज को तैयार किया गया। भगवान ने कूर्मावतार लिया और समुद्र से प्रार्थना की गई। और सब रत्न तो आपस में बाँट लिये गये, परन्तु अमृत को लेकर झगड़ा हुआ। असुर स्वरभानु देवताओं की  पंक्ति में जाकर बैठ गये। सूर्य और चन्द्रमा ने उसे पहचान लिया और मोहिनी अवतार में अमृत  पिला रहे भगवान विष्णु से चुगली कर दी। उन्होंने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर काट दिया। परन्तु वह अमृत सेवन कर चुका था, इसलिए राहु -केतु अमर हो गये। कथानक यह है कि इसीलिए राहु और केतु, सूर्य एवं चन्द्रमा को शत्रु मानते हैं। अमृत पान के कारण इन्हें भी देव योनि में माना गया और नवग्रह मण्डल में इन्हें स्थान मिला। इन्हें भी यज्ञ भाग के रूप में आहुतियाँ दी जाती हैं।

ज्योतिष में राहु से विष, सर्प, षड़यंत्र, भवबंधन, शरीर में सर्पाकृति की रचनाएँ देखी जाती हैं। उधर केतु को चर्मरोग, दंतपीड़ा और मोक्ष से जोड़ा गया।

प्राचीन काल में ग्रहणकाल का निश्चित समय बताकर भारतीय ऋषियों ने अपनी वैज्ञानिक दृष्टि का परिचय दिया था, जिसके कारण लोग ज्योतिष का विश्वास करते थे। राहु और केतु की गति सदा वक्री रहती हैं और वक्री ग्रहों को ज्योतिष में अति शक्तिशाली माना गया। राहु और केतु एक राशि में डेढ़ वर्ष तक रहते हैं और 18 वर्ष में कक्षा का भ्रमण पूरा कर लेते हैं। यद्यपि राहु की महादशा के 18 वर्ष माने गये हैं और केतु की महादशा के 7 वर्ष माने गये हैं। पाराशर ऋषि कहते हैं कि केन्द्र स्थान अर्थात् पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव के स्वामी ग्रह के साथ राहु और केतु केन्द्र स्थान में ही बैठ जाएं तो महान योगों का जन्म होता है। भारत में कई प्रधानमंत्री ऐसे हुए हैं जो राहु-केतु के प्रभाव में ही प्रधानमंत्री बने हैं।

 

शनि रेखा

अवतार कृष्ण चावला

गतांक से आगे ...

शनि रेखा पर आकर मिलने वाली या उसे काटने वाली हर रेखा अपना अलग प्रभाव रखती है। आड़ी आकर काटने वाली रेखा उसकी ताकत में गिरावट लाती है। उसके साथ चलने वाली रेखा उसे शक्तिशाली बनाती है। ये सभी रेखाएं हथेली के भिन्न भागों से प्रारम्भ होती हैं और इनके उद्गम स्थल को देख कर इनके प्रभाव के बारे में जाना जा सकता है।

यदि शुक्र पर्वत पर प्रभाव रेखा से कोई रेखा निकल कर शनि रेखा को काट दे और उसके बाद शनि रेखा कमजोर या टूटी अवस्था में हो तो जातक को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ता है। इसी प्रकार दूषित जीवन रेखा से कोई चिंता रेखा निकल कर शनि रेखा को काटे और उसके बाद शनि रेखा कमजोर हो तो जातक स्वास्थ्य कारणों से जीवनभर आर्थिक रूप से परेशान रहता है।

 

यदि आकस्मिक रेखाएं शनि रेखा को काटने की बजाए उसमें मिल जाएं तो आर्थिक प्रवाह में रूकावट नहीं आती। इसी प्रकार शनि रेखा कमजोर हो और प्रभाव रेखाएं स्पष्ट हों तो जातक अपने प्रयासों से सफलता प्राप्त करता है। दूषित शनि रेखा में चन्द्र पर्वत से आकर प्रभाव रेखा मिले और उसके बाद शनि रेखा स्पष्ट हो तो जातक की प्रगति में किसी बाहरी व्यक्ति का सहयोग होता है। इसी प्रकार शुक्र पर्वत से आकर प्रभाव रेखा शनि रेखा को सपोर्ट करें तो जातक की प्रगति में निकट संबंधियों का सहयोग होता है। मस्तिष्क रेखा से आने वाली इसी तरह की प्रभाव रेखा यह बताती है कि व्यक्ति अपने सही निर्णयों से समस्या से बाहर आने में सक्षम होगा।

शनि रेखा यदि स्पष्ट चलती हुई गुरु के पर्वत पर समाप्त होती है तो व्यक्ति महत्वाकांक्षी होता है और सफलता मिलती है। यदि जीवन रेखा से निकल कर शनि रेखा की सहायक रेखा गुरु पर्वत पर समाप्त होती है तो व्यक्ति को उसके परिवारजनों के सहयोग के कारण सफलता मिलती है।

शनि रेखा जीवन रेखा के अन्दर से निकले और आगे चल कर दूषित हो जाये और शुक्र पर्वत से निकल कर प्रभाव रेखा बुध पर्वत पर स्थित दो भागों में विभाजित स्नेह रेखा को काटती हो तो जातक का वैवाहिक सम्बन्ध असफल होता है और उसकी वजह से उसकी आर्थिक प्रगति में बाधा आती है।

यदि शनि रेखा चन्द्र पर्वत से निकल कर गुरु पर्वत की ओर जाती है तो जातक को अपने जीवनसाथी के सहयोग और अपनी महत्वाकांक्षाओं के कारण सफलता मिलती है।

शनि रेखा शनि पर्वत की ओर बढ़ती हो और उससे प्रभाव रेखा निकलकर गुरु पर्वत की ओर जाए तो व्यक्ति अपनी लीडरशिप योग्यताओं और उच्च महत्वाकांक्षाओं के कारण सफलता प्राप्त करता है। इसी प्रकार यदि यह प्रभाव रेखा सूर्य पर्वत की ओर जाए तो जातक व्यापारी, कलाकार या अभिनेता के रूप में सफल होता है। यदि यह दोनों स्थिति हों तो जातक को धन व यश की प्राप्ति होगी और कला एवं व्यापार में प्रवीणता के कारण अच्छी सफलता प्राप्त होती है। यदि यह प्रभाव रेखा बुध पर्वत की ओर जाए तो व्यक्ति को अपनी योग्यता, व्यापार में दक्षता, विचारों को प्रकट करने की शक्ति और वैज्ञानिक ढंग से सोचने के कारण सफलता प्राप्त होती है।

यदि शनि रेखा शनि पर्वत पर जाकर टूट जाए और जीवन, मस्तिष्क तथा हृदय रेखा दोष युक्त हों तो व्यक्ति अपनी वृद्धावस्था में कष्ट पाता है।

यदि शनि रेखा संपूर्ण रूप से दूषित हो तथा उसके अंत में द्वीप या क्रॉस हो तो व्यक्ति जीवन भर दुःख पाता है और लड़ाई-झगड़े तथा मुकदमे बाजी से घिरा रहेगा।

शनि रेखा बहुत ही व्यापक क्षेत्र है। इसका अध्ययन ध्यान पूर्वक और अन्य रेखाओं को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए वर्ना फलकथन गलत हो सकता है परन्तु ऊपर वर्णित नियमों को ध्यान में रखते हुए सही फलकथन कर व्यक्ति को सही दिशा निर्देश दे सकें तो यह व्यक्ति के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता और वह सही दिशा में जीवनयापन कर सकता है।

वृश्चिक राशि और आप

आपका व्यक्तित्व

राशि चक्र की आठवीं राशि वृश्चिक है। यह एक जल तत्व राशि है। जिस प्रकार निर्मल बहते जल में विद्युत उत्पन्न करने की क्षमता छिपी होती है उसी प्रकार वृश्चिक राशि के व्यक्ति में ऊर्जा का भंडार छिपा हुआ रहता है। इस राशि के व्यक्ति झील के समान होते हैं। ऊपर से शांत झील की गहराई को आंकना असंभव है, इसी प्रकार वृश्चिक राशि के व्यक्तियों के मन की थाह पाना भी लगभग नामुमकिन है। जब ये बाहर से शांत दिख रहे होते हैं, तब भी विचारों और भावनाओं का द्वन्द्व इनके भीतर चलता रहता है।

यह एक स्थिर राशि है। अपने मन में उठने वाले आवेगों पर ये पूरा नियंत्रण रखते हैं। अपने स्वभाव की स्थिरता के कारण लोग इन पर पूर्ण विश्वास करते हैं। इनकी तूफानी प्रतिस्पर्धा और इनमें निहित बल के कारण लोग इनका अनुसरण करने को तैयार हो जाते हैं।

अपने आत्मविश्वास और दृढ़ निश्चय के बल पर ही ये ये उच्च महत्वाकांक्षी होते हैं और फिर अपने कठोर परिश्रम से अपने लक्ष्य को पा लेते हैं। ये अत्यंत विचारशील होते हैं और बिना किसी ठोस आधार के न कोई कल्पना करते हैं, न ही कोई निर्णय लेते हैं। इस राशि के लोग अत्यधिक भावुक और संवेदनशील होते हैं परन्तु अपनी भावनाओं को आसानी से प्रकट नहीं होने देते हैं, भले ही अन्दर ही अन्दर घुटना पड़े।

इस राशि के स्वामी ग्रहों में सेनापति मंगल हैं। वृश्चिक राशि के व्यक्ति जीवन का हर क्षण एक चुनौती की तरह जीते हैं। लकीर का फकीर बनना इन लोगों को कतई पसंद नहीं होता इसलिए ये सदा कुछ न कुछ नया करते रहते हैं। स्थिर राशि होने के कारण मंगल की शक्ति नियंत्रित रहती हैं और इस राशि के व्यक्ति व्यर्थ क्रोध करके अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करते। नेतृत्व शक्ति और अधिकार भावना इनमें कूट-कूट कर भरी होती है। अपनी बात न सिर्फ दृढ़ता के साथ रखते हैं बल्कि आसानी से मनवा भी लेते हैं। ये उदाहरण प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं इसलिए निर्देश देने के बजाए कठोर श्रम करके मापदण्ड तय करते हैं। इनकी खुद से और दूसरों से अपेक्षाएं अत्यधिक होती हैं। इसलिए इन पर कई बार अपनी बात थोपने की सीमा तक चले जाते हैं। इस राशि के व्यक्ति अपने बौद्धिक स्तर के व्यक्तियों के साथ ही सहज हो पाते हैं, इसलिए कई बार घमण्डी मान लिये जाते हैं।

इस राशि का चिह्न बिच्छू है जो एक बेहद आकर्षक परन्तु रहस्यमयी जीव है। इस राशि के व्यक्तियों के व्यक्तित्व में एक विशेष चुम्बकीय आकर्षण होता है। ये अपने मन की बात आसानी से प्रकट नहीं होने देते इसलिए रहस्य का पुट सदा इनसे भरा रहता है।

ये आक्रामक होते हैं और इनकी आक्रमण शैली बिच्छू से मिलती-जुलती होती है। बिना तैयारी के कभी आक्रमण नहीं करते क्योंकि ये सफल आक्रमण पर ही यकीन करते हैं। सही अवसर के लिए ये धैर्यपूर्वक लंबा इंतजार भी कर सकते हैं। पूर्ण तैयारी के साथ सही अवसर पर किया गया इनका वार कभी खाली नहीं जाता।

इनका प्रेम अत्यधिक अधिकार पूर्ण होता है और यदि इनकी भावनाओं की तीव्रता को समझने में भूल हो जाए तो ये आहत हो जाते हैं। भावनात्मक रूप से आहत हो जाने पर ये व्यक्ति प्रतिशोध लेने की सीमा तक भी जा सकते हैं। इस राशि में मूल, पूर्वाषाढ़ा तथा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र आते हैं, अतः इस राशि के व्यक्तियों के जीवन में इन नक्षत्रों के स्वामी ग्रहों केतु, शुक्र एवं सूर्य की महादशाएं आ सकती हैं। यह राशि शरीर में पीठ व रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करती है। इस राशि के व्यक्तियों को चाहिए कि अपने अंतरंग मित्रों से विचार विमर्श करते रहें ताकि भावनाओं की अभिव्यक्ति होती रहे और ये अपनी असीम ऊर्जा का संपूर्ण उपयोग कर सकें।

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