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महादशाएँ बदल रही हैं चीन की पं.सतीश शर्मा, एस्ट्रो साइंस एडिटर

महादशाएँ बदल रही हैं चीन की

पं.सतीश शर्मा, एस्ट्रो साइंस एडिटर

चीन लम्बे समय से शनि महादशा में चल रहा है और यह महादशा अगस्त 2022 में समाप्त हो जाएगी। इसके बाद बुध महादशा शुरु होगी जो कि 17 साल तक चलेगी। चीन की कर्क लग्न की जन्म पत्रिका में शनि यद्यपि मारकेश हैं परन्तु चन्द्र लग्न के स्वामी शनि होने के कारण उनमें शुभत्व आ गया है, जिसके कारण इस महादशा में चीन का प्रभुत्व बढ़ता ही रहा और वह अपने इतिहास के सर्वश्रेष्ठ समय में आ पहुँचा है। कोई भी पाप ग्रह यदि केन्द्राधिपति हो तो शुभ परिणाम देता ही है। परन्तु अब जबकि चीन की महादशा बदल रही है तो वह इतनी शुभ नहीं रहेगी। कम से कम उसकी प्रथम अन्तर्दशा अशुभ रहेगी, क्योंकि बुध ग्रह यद्यपि उच्च के हैं परन्तु अस्त हैं, वक्री हैं और चीन की कुण्डली में अकारक ग्रह हैं। अकारक का अर्थ यह है कि शुभ स्थानों के स्वामी नहीं है। तीसरे और बारहवें भाव के स्वामी होकर बुध उतने प्रभावी नहीं रहेंगे कि चीन को पहले जैसा लाभ दे पाएं।

किसी की भी कुण्डली में बुध ग्रह यदि अति शक्तिशाली हो जाएं या उनकी कुण्डली के बारहवें भाव से सम्बन्ध स्थापित कर लें तो उनका अमेरिका या अमेरिकन कम्पनियाँ या अमेरिकन देशों से सम्बन्ध स्थापित होते हैं। चीन की कुण्डली में ये दोनों बातें देखने को मिलती हैं। बुध ना केवल बारहवें भाव के स्वामी हैं बल्कि अपनी उच्च राशि में स्थित भी हैं। चीन का अमेरिका से व्यापार बहुत अधिक है और व्यापार के अन्दर ही छद्म व्यापार भी प्रभूत मात्रा में हैं। इसलिए न केवल उसके अमेरिका से व्यापार रिश्ते बहुत अच्छे रहे हैं बल्कि अमेरिका के लिए प्रबल चुनौती बन कर उभरा है। चीन का एकसूत्री फार्मूला विश्व की प्रथम शक्ति बनना है और इस क्रम में चीन ने युद्ध, धमकी, प्रत्यक्ष धन निवेश और अप्रत्यक्ष धन निवेश की हर कूटनीतिक चाल को चला है। आश्चर्य की बात यह है कि जैसे किसी गली का गुण्डा लोगों को डरा-धमका कर अपनी सत्ता का अहसास कराता है, चीन उसी तर्ज पर एक शक्तिशाली राष्ट्र होते हुए भी उसी मनोवृत्ति का शिकार है। चीन की साम्राज्यवादी नीतियाँ या विस्तार की भूख अपनी पराकाष्ठा पर आ पहुँची है और अब कोई भी बड़ी घटना अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष में बदल सकती है। चीन की दुविधा यह है कि कल तक जो पड़ौसी राष्ट्र हारे, थके हुए और जर्जर व्यवस्थाओं वाले थे वे अब सभी मायनों में सशक्त होकर उभर रहे हैं। ना पहले वाला जापान है और ना पहले वाला भारत। कभी जापान ने दुस्साहस करके अमेरिका के पर्लहार्बर बदंरगाह पर भयानक आक्रमण कर डाला था। 7 दिसम्बर, 1941 को जापार के युद्धक विमानों ने पर्लहार्बर पर भयानक हमला किया, जिसके कारण यह बन्दरगाह बुरी तरह नष्ट हो गया। अमेरिका के ढाई हजार सैनिक मारे गये तथा अमेरिकी नौसेना और वायुसेना को भारी क्षति पहुँची। यह वह घटना थी जिसने अमेरिका को द्वितीय विश्व युद्ध में धकेल दिया। इसकी अंतिम परिणिति जापान पर अमेरिकी परमाणु हमले के रूप में हुई। परन्तु अब वह जापान पुनः शक्तिशाली है और चीन के चारों ओर शक्तिशाली राष्ट्रों की घेरे बन्दी में शामिल है। न केवल क्वाड देश अर्थात् अमेरिका, भारत, ऑस्टे्रलिया और जापान चीन के विरुद्ध एक हो गये हैं बल्कि ताईवान, वियतनाम भी चीन के खिलाफ हैं। उत्तरी कोरिया जहाँ चीन के साथ है वहाँ दक्षिणी कोरिया क्वाड देशों से सहानुभूति रखता है। दक्षिण चीन सागर और जापान सागर किसी दिन चीन के विरुद्ध तबाही का माध्यम बनेंगे।

चीन का कुल सरकारी ऋण 46 ट्रिलियन है। चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है और अनुमान है कि 2028 तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेगा। अन्तर्राष्ट्रीय मनोविज्ञान चीन के विरुद्ध होने के बाद भी विश्व के अधिकतर उत्पादों में चीन की भूमिका प्रमुख है। परेशानी की बात यही है कि चीन की वर्तमान आबादी 1.5 अरब के आसपास है। इनमें से 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग करीब 27 करोड़ है।

इन्टरनेशनल मानिटरी फण्ड ने 2021 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 12.5 प्रतिशत पर पहुँचने का अनुमान लगाया है तथा चीन से वृद्धि दर अधिक होने के बाद भी चीन के आँकड़े बहुत बड़े हैं। यही कारण है कि भारत अब हथियार विक्रेता के रूप में उभरना चाहता है। हमें ज्ञात रहे कि अधिकांश पश्चिमी देश हथियार निर्यात और औद्योगिक प्रसार से ही धनी हुए हैं।

ज्योतिष की राय विश्व के आर्थिक संगठनों से कुछ अलग है। अप्रैल 2022 से शनिदेव चीन के आठवें भाव में आ जाएंगे जो कि 2022 से ही एक बार पुनः मकर में आकर वापिस कुम्भ में चले जाएंगे, जहाँ वे 29 मार्च 2025 तक रहेंगे। यह समय चीन के लिए खराब रहेगा, क्योंकि चीन के दशम भाव पर शनि की दृष्टि रहेगी। उस समय जब कि बुध महादशा में बुध की अन्तर्दशा रहेगी, चीन में विद्रोह, विखण्डन और सत्ता पलट के षड़यंत्र अपनी पराकाष्ठा पर देखने को मिलेंगे। कई देश चीन का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष आर्थिक दखल रोकने के लिए युद्ध स्तर पर कार्यवाही करेंगे। चीन के विरुद्ध सैन्य संधियाँ उभर कर सामने आएंगी। चीन के राष्ट्रपति अपने पक्ष में चाहे कितने ही संविधान संशोधन करा लें उनको हटाने की मुहिम तेज हो जाएगी। इस क्रम में हिंसा की बड़ी घटनाएँ देखने को मिलेंगी।

चूंकि चीन की चन्द्र लग्न से चौथा भाव पीड़ित रहेगा, इसीलिए 2022 और 2023 में चीन में बाढ़ बारिश और भूकम्प से अत्यधिक हानि होने की संभावना है। शनि की साढ़े साती की आखिरी ढैय्या चीन के लिए अशुभ सिद्ध होगी और उसकी बुध महादशा जो कि अगस्त, 2022 से शुरु होगी अमेरिका को सम्भलने का मौका दे देगी। इसलिये क्योंकि बुध ग्रह अमेरिका का प्रभावी ग्रह है।

 

 

गणदेवता

कुछ देवता ऐसे होते हैं जो सामूहिक रूप से एक ही साथ यज्ञों में पहुंचकर हविर्भाग ग्रहण करते हैं, साथ ही अन्य पूजा उपासनाओं में भी सामूहिक रूप से ही पूजित एवं उपासित होते हैं। अपने अपने लोकों में भी वे सामूहिक रूप से निवास करते हैं तथा उनका सदा कहीं भी एक ही साथ आना-जाना, उठना-बैठना होता है। इसमें उनका परस्पर प्रेम, स्नेहभाव और आन्तरिक सौहार्द ही मूल कारण होता है, न उनमें मतभेद उत्पन्न होता है, न वे विघटित होते हैं और न कभी अपने समूह से कहीं अलग होकर स्थित रहते हैं। इन देवताओं की पारस्परिक सौहार्द-भावना को वेदों में ‘संववन’ ‘संवदन’ आदि नामों से व्यक्त किया गया है, जिनमें सात्ति्वक प्रेम की ही निरन्तर अभिवृद्घि मूल तत्त्व होता है। जहाँ किसी गृह, परिवार, जनपद, राष्ट्र आदि में विघटन प्रारम्भ होता है, वहाँ इन देवताओं की आराधना और संवनन-सूक्त का जप, हवन, पाठ के द्वारा परस्पर सौहार्द एवं सद्भाव की प्राप्ति का प्रयत्न किया जाता है। यह विशेषतया विश्वशान्ति और विश्वबन्धुत्व की भावना के लिये महान उपयोगी होता है।

इस प्रकार के देवताओं की कई कोटियाँ हैं। विभिन्न कोशों के अनुसार इनमें आदित्य, वसुगण, रुद्रगण, विश्वेदेवगण, साध्य, तुषित, आभास्वर, महाराजिक और मरुद्गण आदि विशेष रूप से उल्लेख्य हैं। द्वादश आदित्यों, एकादश रुद्रगणों तथा अष्टवसुओं की तैंतीस देवताओं में भी गणना है। यहाँ इन गणदेवताओं का संक्षेप में परिचय इस प्रकार दिया जा रहा है।

एकादश रुद्र

भगवान रुद्र की वेदों में अपार महिमा है। संहिता आदि में जहाँ जहाँ ‘रुद्र’पद आया है, आचार्य सायणने रुद्रस्य परमेश्वरस्य, रुद्रः परमेश्वरः, जगत्स्रष्टा रुद्रः’आदि कहकर उन्हें परमात्मा ही माना है। ‘रुद्राष्टाध्यायी’, ‘शतरुद्रिय’ आदि तो भगवान रुद्र की महिमा में ही अनवरत निरत हैं। श्वेताश्वतर, माण्डूक्य, कठरुद्र, रुद्रहृदय, रुद्राक्षजाबाल, भस्मजाबाल, पाशुपतब्रह्म, योगतत्त्व तथा निरालम्ब आदि अधिकांश उपनिषदें एक स्वर से रुद्र को ही विश्वाधिपति तथा महेश्वर बताती है। भगवान रुद्र के शिव, महादेव, शंकर, शम्भु, भव, शर्व, मृड, उग्र आदि नाम वेदादि शास्त्रों में अनेक बार महिमामण्डित हुए हैं।

वैदिक संहिताओं में इन्हें कोटि रुद्रों-असंख्य रुद्रों के रूप में विवर्तित कर यह भी बताया गया है कि ये मूलतः एक ही हैं और सम्पूर्ण विश्व में सभी रूपों में व्याप्त हैं।

शिवपुराण का आधा से अधिक भाग रुद्रसंहिता, शतरुद्रसंहिता और कोटिरुद्रसंहिता आदि नामों से भगवान रुद्र की ही महिमा का गान करता है। सभी पुराणों में इनका विस्तृत वर्णन है। ये मूलतः तो हैं एक पुनरपि ये ग्यारह रूपों में विभक्त दिखाये गये हैं। इन ग्यारह रुद्रों के साथ ग्यारह रुद्राणियों का भी वर्णन प्रायः सर्वत्र मिलता है। इनके नामों में थोडा-थोडा अन्तर है। श्रीमद्भागवत (3।12।12।13) में ये नाम इस प्रकार हैं-

रुद्र : मन्यु, मनु, महिनस, महान, शिव, ऋतध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव और धृतव्रत।

रुद्राणियाँ : धी, वृत्ति, उशना, उमा, नियुत, सर्पि, इला, अम्बिका, इरावती, सुधा और दीक्षा।

मूलतः ‘रुद्र’ शब्द की व्युत्पत्ति में निरुक्तकार से लेकर सभी व्याख्याताओं ने इस शब्द को रुद्र धातु से निष्पन्न माना है। रुद्र का रोदन भी वेदों में विस्तार से निरुपित है। तदनुसार ही सभी बालक एवं जीव उत्पन्न होते ही रोते हैं। भगवान रुद्र के अश्रुविन्दुओं से समुद्भूत रुद्राक्ष सभी देवताओं को और रजत पितृगणों को अत्यन्त प्रिय है। गणदेवताओं में रुद्र विशेष महत्त्व के हैं। तैंतीस प्रमुख देवताओं में इनका परिणाम है। अपनी आशुतोषता एवं अकारण-करुणा से भगवान रुद्र भक्तों एवं उपासकों के सर्वस्व हैं।

द्वादश आदित्य

माता अदिति के पुत्र होने से भगवान सूर्य का नाम आदित्य भी है। वेदों में आदित्य नाम से भगवान सूर्य की महिमा का वर्णन किया गया है। ब्राह्मण ग्रन्थों में आदित्यों की संख्या बारह बतायी गयी है। वेदों में वर्णित तैंतीस देवताओं में बारह आदित्यगण ये ही हैं। पुराणों में भी सूर्यरथ के वर्णन प्रकरण में बारह महीनों में बारह आदित्य ही बारह नामों से अभिहित किये गये हैं- धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान, त्वष्टा, विष्णु, अंशु, भग, पूषा तथा पर्जन्य।

महाभारत के आदि पर्व में भी ये ही नाम आये हैं, किन्तु नामों के क्रम में अन्तर है। यथा-

अदित्यां द्वादशादित्याः सम्भूता भुवनेश्वराः।

धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च।

भगो विवस्वान् पूषा सविता दशमस्तथा॥

एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते।

जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिकः॥

‘अदिति के पुत्र बारह आदित्य हुए, जो लोकेश्वर हैं। धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, दसवें सविता, ग्यारहवें त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे जाते हैं। इन सब आदित्यों में विष्णु छोटे हैं, किन्तु गुणों में वे सबसे बढ़कर हैं।’

अष्टवसुगण

आठ देवताओं का एक विशिष्ट गण-विशेष है, जिसे ‘अष्टवसु’कहा जाता है। वेदादि में जो मुख्य तैंतीस देवता निरुपित हैं, उनमें अष्टवसु भी परिगणित हैं। यास्काचार्य ने वसुओं को इन्द्र, अग्नि एवं आदित्य के साथ संस्तुत होने के कारण पृथिवीस्थानीय, अन्तरिक्षस्थानीय एवं द्युस्थानीय- इस प्रकार त्रिस्थानीय देवता बताया है (निरु. 7। 4। 41-42)। पुराणों के अनुसार दक्षप्रजापति ने अपनी साठ कन्याओं में से  दस का विवाह धर्म के साथ किया। उनमें से ‘वसु’ से उत्पन्न  होने के कारण ये वसु कहलाये। ये संख्या में आठ हैं। विभिन्न पुराणों में इनके नाम तथा क्रम भिन्न भिन्न प्रकार से प्राप्त होते हैं। श्रीमद्भागवत (6। 6। 10-11) में इनके नाम इस प्रकार हैं- द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु तथा विभावसु। विष्णुपुराण (1। 15) के अनुसार इनके नाम इस प्रकार हैं- आप ध्रुव, सोम, धर्म, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास। श्रीमद्भागवत (2। 3। 3) में उल्लेख आया है कि सभी प्रकार के ऐश्वर्यादिकी प्राप्ति के लिये भी वसुदेवताओं की उपासना की जाती है- ‘वसुकामो वसून्।’

स्मृतियों तथा कहीं कहीं पुराणादि में वसुओं को वसुगण धर्म के पुत्र होने के कारण साक्षात् धर्मस्वरुप पितृस्वरूप भी बतलाया गया है और श्राद्घादि कर्म में तर्पण तथा पिण्डादि दान से इनकी पूजाकर पितरों के रूप में इन्हें आप्यायित किया जाता है। मनुस्मृति (3। 284) का कथन है-

वसून् वदन्ति तु पितृन् रुद्रांश्वैव पितामहान्।

प्रपितामहांस्तथादित्याञ्छ्रुतिरेषा सनातनी॥

 

वर्गाकार हाथ

जैनेन्द्र कुमार

                वर्गाकार हाथ वाले जातक परिवार और समाज दोनों से प्रेम करते हैं और दोनों के प्रति अपने कर्तर्व्यों की निष्पत्ति करते हैं। रीति-रिवाज को तोड़ना या लीक से हटकर चलना इनके वश की बात नहीं होती है। ये कुछ भी करने से पूर्व यह सुनिश्चित करना जरूरी समझते हैं कि जो कुछ वे करने जा रहे हैं वह नैतिक, सामाजिक, वैधानिक और सांस्कृतिक रूप से सही होना चाहिए, जिससे इन्हें ध्येय की प्राप्ति के दौरान गतिरोध विरोध के स्थान पर सम्मान सहयोग की प्राप्ति होती रहे। संतोषी सदा सुखी वाली कहावत इनपर सटीकता से लागू होती है। संतोषी वृत्ति होने पर सदैव इनमें आगे बढ़ने की ललक पाई जाती है।

 

                हार मानना तो इन्हें आता ही नहीं ये अपने प्रयास तब तक जारी रखते हैं जब तक कि सफलता इनकी झोली में गिरे। ये अपने सिद्धांतों को कभी नहीं तोड़ते हैं और सिद्धांतवादिता के कारण एक हद तक ये आत्म-नियंत्रित होते हैं। दूसरों के बजाय स्वयं सुधार पर इनका ज्यादा जोर रहता है। लोगों का अनुसरण अनुकरण करना इन्हें जरा भी नहीं सुहाता है और ये अपना रास्ता खुद बनाते हैं, परंतुु ऐसा करते समय सामाजिक वर्जनाओं सांस्कृतिक आदर्श-मूल्यों का भी ध्यान रखते हैं इस कारण जीवन में कई बार कई मौकों पर ये अग्रदूत या अगुआ की भूमिका का निर्वाह करते हैं, पर ऐसे करते समय भी ये आत्म-नियंत्रित होते हैं कि स्वेच्छाचारी। नियमितता, नियमनिष्ठता, निरंतरता और क्रमबद्धता इसकी कार्यशैली में निहित होते हैं। काव्य, कल्पना, नाटक में इनकी रुचि नहीं होती और स्वप्नदृष्टा होकर ये यर्थाथपरक होते हैं। इनके सोचने का नजरिया व्यावहारिक आत्म-केंद्रित होता है। इस कारण प्रायः ये अपने जीवन के उद्देश्यों की प्राप्ति में सफलता अर्जित करते हैं।

ये जातक आस्थावान आस्तिक होते हैं। धार्मिक मान्यताओं धारणाओं का सम्मान करते हैं और धर्मानुकूल आचरण करते हैं। आस्तिक होते हैं पर धर्मांध नहीं होते हैं। यद्यपि ये धर्मानुकूल आचरण करते हैं पर किसी भी बात पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं करते अर्थात् अंधविश्वासी नहीं होते हैं। सामाजिक, धार्मिक सामाजिक मामलों में स्पष्ट दृढ़ विचारधारा रखते हैं। छल, कपट चालाकी से यथासंभव दूर रहते हैं। समाज में आम आदमी की तरह रहना और कठोर परिश्रम करना ही इनकी नियति होती है। दिखावा नहीं करते और शेखी बघारने वालों को पसंद भी नहीं करते हैं। अपने काम से काम रखते हैं, ये किसी के मामले में अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं और ही किसी का हस्तक्षेप करना इन्हें भाता है। दोस्ती प्रेम-प्रसंग में भी ईमादारी की पालना करते हैं और जो भी वादा करते हैं उसे निभाते हैं। सरल हृदय होते हैं और अपने मन की बात अपने निकटस्थों को बता देते हैं। नए-नए कार्यों, तकनीकों को सीखने में इनकी रुचि होती है और मौका मिलने पर शीघ्र ही ये अपनी मेहनत के बल पर अपने समकक्षों से कहीं आगे निकल जाते हैं। किसी भी कार्य में शीघ्र ही कुशलता प्राप्त कर लेते हैं। सीखना और सिखाना दोनों ही इन्हें भाता है। व्यर्थ के वाद-विवाद या बाल की खाल निकालने में इनकी दिलचस्पी नहीं होती है। जीओ और जीने दो वाली कहावत को चरितार्थ करते नजर आते हैं। किसी भी मामले को शीघ्र ही जानने-समझने की क्षमता होते हुए भी ये दिखावा अहंकार श्रेष्ठता की भावना से ग्रसित नहीं होते हैं।

वर्गाकार हाथ वाले जातक देश, समाज संसार सभी के लिए उपयोगी साबित होते हैं। इनका दृष्टिकोण सकारात्मक होता है। शक्ति सामर्थ्य के धनी होने पर भी ये अपनी विकसित विवेक शक्ति और प्रबल मानसिक क्षमता के बल पर स्वंय को शिष्टता के दायरे में कैद करने में सफल रहते हैं। पिछलग्गूपना, चुगलखोरी, कायरता, चालाकी आदि को ये नापसंद करते हैं। हर चीज सेवा का कैसे उपयोग किया जाए इस बात की इन्हें गहरी समझ होती है। दूसरों से बजाय स्वयं पर विश्वास करते हैं। पराधीनता, तनावग्रस्तता प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य सहनशीलता से काम लेते हैं। शोषित होने पर उग्र हिंसक प्रदर्शन के स्थान पर उदार रहकर युक्तिसंगतता से विरोध दर्ज करते हैं। मौखिक विवाद के स्थान पर लिखित और ठोस कार्यवाही करते हैं, पर जब किसी बात पर अड़ जाते हैं तो आसानी से झुकते नहीं हैं।

ये जातक हर काम को व्यवस्थित  तरीके से पूरा करते हैं। हर चीज को यथास्थान पर देखना चाहते हैं। आलस आसक्ति से दूर रहते हैं। पैसा कमाने की बात हो या जीवनसाथी चुनने का मामला हर निर्णय में आदर्शवाद के स्थान पर व्यावहारिकता को ही तरजीह देते हैं। तर्क-कुतर्क दूसरों की बुराई करना इन्हें पसंद नहीं होता है। काम दिखाने के स्थान पर काम करने की प्रवृत्ति इनमें पाई जाती है। सफल और अपने से योग्य लोगों के जीवन से प्रेरणा लेकर ये अपने जीवन को सरल सरस बना लेते हैं और अपने जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना बड़ी कुशलता से साथ करते हैं। इन्हें अतीत से सीखना और वर्तमान को संवारना आता है। व्यक्तिगत हितों के स्थान पर सार्वजनिक हितों का ध्यान रखते हैं। विशालता, फैलाव प्रसार इन्हें पसंद होता है। अतः इन्हें जमीन से जुड़े लोग कहा जा सकता है।

शिव के सामने काली

विनय प्रसाद गुप्त

लोक विश्वास के अनुसार शिव के नजदीक पार्वती को रहना चाहिये जो उनकी पत्नी है, शक्ति है। शिव और शक्ति की महिमा धर्मशास्त्रों में विद्यमान है। तंत्र मार्गी तो शिव और शक्ति में भेद नहीं मानते हैं। इनके अभेद स्वरूप ही अर्धनारीश्वर है। वे शिव में शक्ति और शक्ति में शिव का दर्शन करते हैं। यही कारण है कि मंदिरों में शिव की प्रतिमा का शिवलिंग के नजदीक पार्वती की प्रतिमा स्थापित की जाती है परंतु बटकेश्वर शिवलिंग के सामने काली की प्रतिमा है। बटेश्वर शिवलिंग बटेश्वर स्थान के बटेश्वर पहाड़ी पर बटेश्वर मंदिर में है। यह मंदिर कहलगाँव रेलवे स्टेशन से 11 किलोमीटर उत्तर की ओर स्थित है। हरी-भरी पहाड़ी के पश्चिम ढाल पर मंदिर बड़ा ही मनोरम लगता है। इस मंदिर के आगे उत्तरवाहिनी गंगा कल कल स्वर करती हुई बहती है और इसी जगह से वह पूरब की ओर मुड़ जाती है। गंगा नदी का यह मुड़ान मंदिर के बगल से होता है, जिससे भी मंदिर की शोभा बढ़ जाती है। यात्रियों के बैठने के लिये इस मुड़ाव के स्थल पर कई गोलनुमा पक्के छत्तर बना दिये गये हैं। इससे इस जगह की सुंदरता बढ़ जाती है। यह सुन्दर जगह मंदिर के बगल में ही है। मंदिर परिसर में एक गुफा है जो वशिष्ठ मुनि के नाम पर वशिष्ठेश्वर गुफा कहलाती है। गुफा के पास ही शिव मंदिर है। क्षेत्र के लोगों का विश्वास है कि इस शिवलिंग की स्थापना वशिष्ठ मुनि के द्वारा हुई थी। इस कारण पहले यह वशिष्ठेश्वर शिवलिंग कहलाने लगा था। बाद में वशिष्ठेश्वर से बटेश्वर शिवलिंग कहलाने लगा था। भाषा विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार शब्द में यह बदलाव संभव है। भाषा अपने आप में समयानुसार बदलती रहती है। गंगा किनारे इस स्थान पर हाल का बना हुआ वशिष्ठ द्वार वशिष्ठ मुनि की याद दिलाता है।

प्राचीन काल में वशिष्ठ मुनि ने  इस स्थान में शक्ति की भी पूजा की थी। अभी भी काली की मूर्ति के अनुसार शिवलिंग के सामने शक्ति के प्रतीक रूप में अवस्थित है। यह सही है कि शिव और काली दोनों इस क्षेत्र के आदिवासियों के देव-देवी है, परंतु पुराणों से ज्ञात होता है कि शिव के सामने काली की मूर्ति लोगों को हैरत में डाल देती है। परंतु पुराणों से ज्ञात होता है कि शिव के सामने काली की मूर्ति हो सकती है। मार्कण्डेय पुराण तथा दुर्गा सप्तशती में काली की उत्पत्ति पार्वती के शरीर से बताई गई है।

काली देवी की उत्पत्ति की चर्चा इस प्रकार है : पार्वती के शरीर कोश से कौशिकी की उत्पत्ति हुई और ऐसा होने पर पार्वती का शरीर काले रंग का हो गया और पार्वती काली देवी के नाम से विख्यात हो गई। इस प्रकार काली अयोनिजा है अर्थात उसकी उत्पत्ति योनि से नहीं हुई। ब्रह्मा ने शुम्भ और निशुम्भ को वरदान दिया था कि उन्हें कोई पुरुष नहीं मार सकेगा सिर्फ अयोनिजा कुमारी ही उन्हें मार सकती है। इस प्रकार काली जो अयोनिजा थी, वह वास्तव में पार्वती का ही दूसरा रूप था। अतः कहलगाँव के बटेश्वर मंदिर में शिवलिंग के सामने जो काली की प्रतिमा स्थापित है, वह अस्वाभाविक नहीं है शास्त्र सम्मत है। कौशिकी के प्रतीक रूप में कोसी नदी अभी भी गंगा से मिलती है और उसका संगम बटेश्वर के ही समीप है।

बाद में शिव के साथ शक्ति (काली) मंत्रयान था वज्रयान की भी एक पहचान हो गई थी। मंत्र और तंत्र से सिद्धि प्राप्त की जाती थी। बटेश्वर में शिव के सामने शक्ति (काली देवी) की प्रतिमा यह स्पष्ट करती है कि यह स्थान तंत्र का पीठ था। अतः शिवलिंग के सामने काली की मूर्ति सापेक्ष है।

अवसाद और वास्तु दोष

डॉ. सुमित्रा अग्रवाल

 अवसाद या डिप्रेशन या मानसिक दबाव या उदासी एक तीव्र मानसिक रोग या सिंड्रोम है जिसमे सोचने समझने की क्षमता प्रभावित होती है। फलस्वरुप वह यथोचित निर्णय नहीं ले पता है और दु: में डूबा रहता है। अधिकतर यह अवस्था व्यक्ति के प्रेम संबंध में असफलता, अपने जीवनसाथी के प्रति बहुत अधिक लगाव और साथी से उतना प्रेम मिल पाना, प्रेम में धोखा या आपसी द्वन्द के कारण, घाटा, कर्ज या बीमारी उत्पन होती है। उग्र स्वभाव, कटु भाषा का प्रयोग, यहाँ तक की गाली-गलौज अत्यधिक शक करना, सर्वत्र निराशा, तनाव, अशांति, अरुचि आम लक्षण हैं। डिप्रेशन की अवस्था में व्यक्ति स्वयं को लाचार और निराश महसूस करता है। सुख, शांति, सफलता, खुशी सब बेमानी हो जाते हैं।

 डिप्रेशन के ज्यादातर रोगियों में नींद की समस्या होती है। डिप्रेशन के अनेक और भी कारण हैं - बैलेंस्ड डाइट नहीं खाना, शरीर में किसी मिनरल या विटामिन का अभाव, कुपोषण, आनुवांशिकता, हार्मोन में गड़बड़ी, मौसम के प्रभाव से, अप्रिय स्थितियों में लंबे समय तक रहना जैसे कि अभी के समय में कोरोना में कई करोड़ लोग डिप्रेशन से ग्रसित हो गए हैं, तनाव, गंभीर बीमारी के फलस्वरूप, नशा, मस्तिष्क के ट्यूमर  या कैंसर, जैवरासायनिक असंतुलन, कुछ औषधियों के साइड इफेक्ट (हाई ब्लड प्रेशर की दवा) आदि। डिप्रेशन लाइलाज रोग नहीं है, यह समय के साथ ठीक हो सकता है। यह अवसाद स्वाभाविक होता है किन्तु यदि यह दु: मन की गहराइयों में उतर जाता है तो इसका रोगी के शरीर एवं मानसिक दशा पर प्रभाव पड़ने लगता है और उसके व्यक्तित्व में परिवर्तन आने लगता है। भूख मर जाती है, वजन कम होने लगता है, अकारण ही चिंतित रहता हैविचित्र ध्वनियां सुनायी देने लगती हैं, अपने कार्य को सुचारु रूप से करने में असफल होता है।

स्त्री-पुरुष में महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा डिप्रेशन की शिकार अधिक होती हैं, इसके कई कारण होते हैं -

व्यक्तिगत, सामाजिक, विवाह के बाद ससुराल में अक्सर लड़कियों को डिप्रेशन का शिकार होते देखा गया है। आंकड़ों के अनुसार दस पुरुष में एक को डिप्रेशन होता है जबकि दस महिलाओं में हर पाँच को डिप्रेशन होता है।

डिप्रेशन ज्यादा होने से रोगी आत्महत्या तक कर सकते हैं, इसलिए घर वालों को ध्यान रहना चाहिए कि रोगी को अकेले में गुमसुम रहने दें, सकारात्मक बातें करें, अच्छे मनोचिकित्सक के पास ले जाएं।

डिप्रेशन सिर्फ आज के मानव को हो रहा है ऐसा नहीं है। श्रीमद् भगवत गीता जो कि हमारा धार्मिक ग्रन्थ है। उस महान ग्रन्थ का निर्माण भी अवसाद के कारण ही हुआ था। कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन अपने प्रियजनों को युद्ध भूमि में देखते हैं तब श्री कृष्ण से दोनों सेनाओं के बीच रथ को ले जाने का आग्रह करते हैं और अवसाद में कर अपना गांडीव रख देते हैं। गीता का ज्ञान अर्जुन को अवसाद से निकलने के लिए ही श्री कृष्ण ने कहा था। आज छोटे-छोटे बच्चों को भी अवसाद होता है, वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारा खान-पान हमारी आंतों को इर्रिटेट करता है, हमारा भोजन आज सात्विक नहीं रह गया है और हम चिडचिड़े और अवसाद ग्रस्त पहले की अपेक्षा अधिक रहने लगे हैं। यहाँ तक की अनाज या फल या सब्जी में अधिक कीटनाशकों के इफेक्ट से भी अवसाद बढ़ रहा है। चीनी का सेवन भी इस रोग को बढ़ाता है।

उपचार - रोगी के अवसाद का कारण जानने की कोशिश करें और उसके निदान का प्रयास करें।  अगर रोगी चरमसीमा में हो तो आत्महत्या से बचाव से रास्ते करें।  रोगी के मनोबल को बढ़ाने का प्रयास करें, एलोपैथिक या होम्योपैथिक दवाओं का सहारा लें।

आहार - आहार, व्यवहार और विचार का सीधा सम्बन्ध है।  अवसाद ग्रस्त व्यक्ति को बहुत ज्यादा स्पाइसी खाना नहीं खाना चाहिए, चीनी की मात्रा एक दम कम, सुबह उठ के गरम पानी, रात में भिगोए हुए बादाम, अखरोट खाना चाहिए। नाश्ते में - इडली, उपमा, दलिया, सेवई, दही, बेसन की रोटी जैसी चीजें खानी चाहिये।  फूड़ एलर्जी टेस्ट करके जिन चीजों से एलर्जी मिलें उनको बंद करना चाहिए। रक्त की जाँच करानी चाहिए और देखना चाहिए किन विटामिन्स या मिनरल्स की कमी है शरीर में, उनका सप्लीमेंट्स या मेडिसिन्स लेना चाहिए।

वास्तु दोष - आज का मानव ज्यादा विषाद ग्रस्त है, एक कारण खाना है और दूसरा कारण हमारा फ्लैट सिस्टम के घरों में रहना भी है। वास्तु पुरुष वास्तु के देव हैं और वह वास्तु सम्मत घरों में समृद्धि लाते हैं और उलंघन होने से देवता सम्बन्धी समस्याएं। नार्थ वेस्ट में  बना हुआ बेडरूम अवसाद देगा। नार्थ वेस्ट एक ऐसा जोन है जहाँ आपको सावधानी रखना ही चाहिए, तो यहाँ बेडरूम बनाएं, स्टडी रूम सामान रखने की जगह, मुख्य द्वार। अगर आपके घर में किसी को डिप्रेशन है तो अपना नार्थ वेस्ट को चेक करें और किसी सशाक्त वास्तु शास्त्र से सालाह लें।

लखनऊ

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