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अपनी राशि मकर में कल्याणकारी हैं शनि पं. सतीश शर्मा, एस्ट्रो साइंस एडिटर, नेशनल दुनिया

मकर राशि में प्रवेश के बाद शनि देव ने विश्वव्यापी घटनाओं को जन्म दिया, यद्यपि अन्य ग्रहों का सहयोग भी रहा है। भारत के संदर्भ में बात इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वराहमिहिर और टॉलेमी दोनों ने भारत की प्रभाव राशि को मकर माना है।

यह मेदिनी ज्योतिष के अन्तर्गत है, जिसमें राष्ट्रों के बारे में निर्णय करते हैं। परन्तु वैसे भी भारत की जन्म पत्रिका वृषभ है और इसलिए भारत के धर्म-कर्म स्थान के स्वामी भी शनि हैं। यही कारण है कि राम मंदिर पर निर्णय जैसी परिस्थितियाँ आईं, जो कि धर्म का विषय है और उधर भारत कर्मक्षेत्र में भी कई अर्थों में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। विश्व शक्तियों में अपना स्थान बनाना, चीन के द्वारा उत्पन्न मनोवैज्ञानिक भय से मुक्ति, पाकिस्तान के परमाणु बम की हवा निकालना, कोरोना पर प्रभावी नियंत्रण तथा गरीबों के हित में कल्याणकारी योजनाएँ। गत 24 जनवरी, 2020 को शनिदेव ने मकर राशि में प्रवेश किया और वे 29 अप्रैल, 2022  को कुम्भ राशि में प्रवेश कर जाएंगे और वहाँ 12 जुलाई तक रहते हुए पुन: मकर राशि में आ जाएंगे, जैसे कि कोई विशेष परिणाम देना भूल गये हों और पुन: मकर राशि में ही रहते हुए 17 जनवरी, 2023 को कुम्भ राशि में प्रवेश करेंगे। यह खगोलीय घटना असाधारण सिद्ध हो सकती है और भारत के लिए लाभकारी सिद्ध होगी।

कैसे हैं शनिदेव -

अन्य ग्रहों की भांति शनि भी एक ग्रह हैं और उन्हें ब्रह्मा की सभा में स्थान प्राप्त है। उन्हें यज्ञ भाग मिलता है और श्राप या वरदान देने की शक्तियाँ प्राप्त हैं। नवग्रह मण्डल में उन्हें स्थान प्राप्त है तथा किसी भी कर्मकाण्ड में अन्य ग्रहों के साथ-साथ उनका भी आह्वान किया जाता है।

शनि अपनी ढैया (लघु कल्याणी) और साढ़ेसाती को लेकर बहुत बदनाम हैं। पुराण कथाओं में महाराज दशरथ का उल्लेख आता है कि अपनी प्रजा को शनि द्वारा रोहिणी के शकट भेद (रोहिणी तारा मण्डल में प्रवेश) के बाद आसन्न अकाल और पीड़ा से बचाने के लिये वे शनिदेव से युद्ध करने को तैयार हो गये। महाराजा दशरथ की प्रजा वत्सलता को देखते हुये शनिदेव प्रसन्न हुये और उन्हें वरदान दिया कि  वे भविष्य में रोहिणी नक्षत्र का शकट भेद नहीं करेंगे।

शनि के अतिरिक्त कुछ अन्य ग्रहों का भी रोहिणी तारा मण्डल में से भ्रमण शुभ नहीं बताया गया है। वास्तव में यह एक खगोलीय गणना है कि शनिदेव अपनी कक्षा में भ्रमण के समय रोहिणी नक्षत्र से बाहर ही रह जाते हैं और उसमें प्रवेश नहीं कर पाते हैं।

शनि देव नीलवर्णी हैं -

शनि को सूर्य और छाया से उत्पन्न माना गया है। सूर्य से दूरस्थ कथा में स्थित शनि का नीला रंग भारतीय वाङ्गमय में अति प्रतिष्ठित है। भारतीय दार्शनिक चिंतन में नीले रंग को ईश्वरीय गुणों की ओर बढ़ता हुआ माना गया है। भगवान राम और कृष्ण की छवि में इस बात की झलक मिल जाती है।

वेदांग ज्योतिष में शनि को दण्डनायक भी कहा गया है। वे कर्मों का दण्डफल प्रदान करते हैं। ज्योतिष ग्रंथों में इस बात का विवरण मिलता है कि यदि शनिदेव योगकारक हों तो अपनी दशा में बहुत अधिक सफलता प्रदान करते हैं और भूमि और अधिकार की प्राप्ति कराते हैं। दूसरी ओर जब शनि मारकेश की श्रेणी में आते हैं तो अन्य ग्रहों को अपेक्षा स्वयं ही मारक ग्रह की भूमिका निभाते हैं, उन्हें आयु का कारक माना गया है।

शनि की साढ़ेसाती -

जन्मकालीन राशि से बारहवें भाव, राशि वाला भाव व उससे अगले भाव पर शनि जब कुल मिलाकर साढ़े सात वर्ष जब भ्रमण करते हैं तो इसे साढ़ेसाती कहा जाता है। जनमानस में शनि की साढ़ेसाती को लेकर बहुत अधिक भय व्याप्त है। लोग बहुत सारी भ्रांत धारणाओं के चलते भयभीत रहते हैं। सच तो यह है कि कई बार तो लोगों का भाग्योदय साढ़ेसाती के कारण ही होता है। उदाहरण के तौर पर वृश्चिक राशि में साढ़ेसाती की पहली ढैया अत्यन्त शुभ जा सकती है, मकर राशि की पहली ढैया और दूसरी ढैया तथा तीसरी ढैया भी जीवन के कई विषयों में अत्यधिक शुभ परिणाम दे सकती है। सिंह राशि की साढ़ेसाती भी अपनी आधे से ज्यादा अवधि में शुभ परिणाम दे सकती है। वृषभ राशि के लिये शनि की साढ़ेसाती के पहले पांच साल श्रेष्ठ जा सकते हैं।

साढ़ेसाती के कुछ काल में कभी-कभी दु:ख आते पाये गये हैं परंतु ऐसा तो अन्य कई ग्रहों के साथ भी है। प्राचीनकाल में ऋषि-मुनि साढ़ेसाती की प्रतीक्षा किया करते थे, जिससे कि शरीर कष्ट या अन्य भौतिकतापों से उनके पाप कर्म क्षय हों और मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो।

शनिदेव से डरने की आवश्यकता नहीं है। वे साढ़ेसाती के समय भी आधे से अधिक मामलों में कल्याणकारी हैं। धन-दोहन के उद्देश्य से उनके प्रति अधिक भय उत्पन्न कर दिया गया है। सच तो यह है कि सार्वजनिक जीवन में भूमि, अधिकार सम्पन्नता एवं प्रतिष्ठा देने में शनि की भूमिका बहुत बड़ी है। उनकी महादशा अवधि 19 वर्ष होने के कारण सफलता का समय भी अधिक समय तक रहता है।

 

 

 

क्या कुछ धमाल करेंगे शनि ?

15 जनवरी, 2021 को शनि सहित उनकी अपनी राशि में 4 और ग्रह रहेंगे। इसी तरह से 11 फरवरी के दिन मकर राशि में ही 6 ग्रह रहेंगे। यह असाधारण ग्रह स्थितियाँ हैं और विश्वव्यापी परिणाम दे सकती हैं। अमेरिका के व्हाइट हाउस में जो चल रहा है, वह इसी की पृष्ठभूमि है। युद्ध और प्राकृतिक घटनाएँ इस तरह की ग्रह स्थितियों के सहज परिणाम हैं। जैमिनी ऋषि के अनुसार तो इस अवधि में मकर राशि और भारत समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं। परन्तु म्लेच्छ देशों में दुष्परिणाम देखने को मिल सकते हैं। तात्कालिक रूप से 7 जनवरी से अस्त हुए शनि, जो कि 10 फरवरी तक अस्त रहेंगे, अमेरिका के व्हाइट हाउस में उत्पन्न परिस्थितियों व उसके परिणामों को प्रभावित कर रहे हैं, उधर किसान आन्दोलन में भी कुछ-न-कुछ विशेष घटित होने वाला है। नजरें लगाये रहिए।

 

 

हाथ की रेखाओं से जाने अपना भविष्य

प्रत्येक व्यक्ति अपने भविष्य के बारे में जानने के लिए इच्छुक रहता है, चाहे वह जन्म पत्रिका, अंक ज्योतिष, रमन विद्या, टेरो कार्ड या सामुद्रिक शास्त्र आदि। सामुद्रिक शास्त्र के लिए शास्त्रों में एक कथा का उल्लेख मिलता है- भगवान शंकर के आशीर्वाद से उनके ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय ने जनमानस की भलाई के लिए हस्तरेखा शास्त्र की रचना की। जब यह शास्त्र पूरा होने लगा तो श्रीगणेशजी ने आवेश में आकर इस शास्त्र को समुद्र में फेंक दिया। भगवान शंकर ने समुद्र से आग्रह किया कि वह हस्तलिपि वापस करें और भगवान शंकर जी के आग्रह पर समुद्र ने हस्तलिपि वापिस कर दी। तब से इसका नाम भगवान शंकर जी ने सामुद्रिक शास्त्र रख दिया। हस्तरेखा को सामुद्रिक शास्त्र भी कहा जाता है। जिस किसी व्यक्ति का जन्म समय ना हो वह हस्तरेखा से अपना भविष्य, बिजनेस और नौकरी में आगे बढ़ेगा, यह सब हस्त रेखाओं से ज्ञात किया जा सकता है। जन्म पत्रिका में तो फिर भी समय शुद्धि न होने के कारण कई बार संशय हो जाता है परन्तु हस्तरेखा विधाता की ऐसी विद्या है जो हर कोई को सटीक भविष्य बताने में  समर्थ है। इस लेख में हम हस्त रेखा से व्यक्ति कर्म क्षेत्र में किस दिशा में आगे बढ़ेगा, के  बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे -

1.            उच्च शिक्षणाधिकारी योग : जिस हाथ में गुरु, शनि, रवि व बुध ये पर्वत निर्दोष व अच्छे उठावदार हो एवं अंगुलियाँ लम्बी, (बोटे) ऊपर के भाग मोटे, सूर्य रेखा प्रभावी हो तथा अनामिका (तीसरी अगुंली) का मध्य भाग का दूसरा बीच का पौर लम्बा बड़ा हो तो जातक उच्च शिक्षणाधिकारी होता है।

 

2.            शिक्षक व प्रोफेसर योग : जिस हाथ की अगुंलियाँ ऊपर से चौकोरी बुध, मंगल व शनि पर्वत उठे हुए एवं मस्तिष्क व जीवन रेखा आरम्भ से दोनों रेखाओं में थोड़ा अन्तर हो। मस्तिष्क रेखा निर्दोष व अंत:करण रेखा अच्छी हो। करांगुली एक समान पतली तथा बोट भी पतले हो तो जातक शिक्षक व प्रोफेसर होता है।

3.            कलाकार योग : हाथ की अंगुलियाँ समकोनाकृति हों। शुक्र पर्वत उठावदार हो, मस्तिष्क रेखा की एक शाखा बुध पर्वत पर जाती है, सूर्य अंगुली का ऊपरी भाग गोल, पतला तथा समस्त अंगुलियों के बोट का झुकाव अलग-अलग हो तो कलाकार योग होता है।

4.            सर्जन व डाक्टर योग : जिस हाथ में मंगल व बुध पर्वत अच्छे उठे हुए हों तथा अंगुलियाँ लम्बी, अंगुलियों के आगे के बोट गोल, बोट की संधि गाठीनी युक्त हो व बुध पर्वत पर तीन खड़ी रेखाएं हों। सूर्य रेखा व मस्तिष्क रेखा गहरी, साफ व उठावदार हो तो जातक सर्जन व डाक्टर

बनता हैं।

5.            वैद्य या हकीम योग : जिस हाथ में मस्तिष्क रेखा मामूली झुकी हुई (वांकडी) हो, अगूंठा मजबूत हो व बुध पर्वत उठावदार हों तथा बुध माऊण्ट पर 1/2 खड़ी विज्ञान रेखा हो अंगुलियों के बोट अलग-अलग एवं गोल व चपटी हो तो व्यक्ति वैद्य या हकीम होता है।

6.            उद्योगपति व व्यापार योग : जिस हाथ का तलवा पतला, गोल व चपटा हो और सूर्य के बोट (मध्यमा) दोनों बराबर हों। मस्तिष्क रेखा-सीधी सरल हो तो मनुष्य व्यापारी पेठीवाला, उद्योगपति होता है। 2. जिसकी अंगुलियों के बोट (नोंक) लम्बे, सूर्य, शुक्र, बुध पर्वत उठावदार हों तथा हाथ के तलवे गोल, चपटे व पतले हो तो वे हीरा, जवाहरात का धंधा करते हैं।

7.            इंजीनियर योग : हाथ की बोटे गोल, पतली व चपटी हो तथा चन्द्र पर्वत उठावदार तथा दोनों मंगल पर्वत उठावदार, तर्जनी सरल अंगूठा लम्बा हो तो जातक इंजीनियर बनता है।

 

8.            जज, बैरिस्टर, वकील योग : जिस हाथ में हृदय रेखा व मस्तिष्क रेखा के बीच के मध्य में बड़ा चौकोर बनता हो तथा मस्तिक रेखा साफ सुथरी हो तथा करांगुली का पहला पोर लम्बा हो, तर्जनी सरल हो तथा रवि (अनामिका) पर्वत अच्छा उन्नत हो तो न्यायाधीश बनता है एवं दयालु स्वभाव का होता है।

स्वाहा नहीं बोला, तो आहुति बेकार है

पृथ्वी पर प्रारम्भ में देवता और मनुष्य एक साथ रहते थे तथा कल्प वृक्ष ही उनकी आपूर्ति करता था। मनुष्य को कालारान्तर में अहंकार उत्पन्न हुआ। देवता नाराज हुए और कल्प वृक्ष को लेकर स्वर्ग चले गये। अब मनुष्यों को पृथ्वी पर उत्पन्न शाक और वनस्पितियों पर निर्भर रहना पड़ा। उन्हें सर्दी, गर्मी और भूख जैसे पृथ्वी के भौतिक ताप सताने लगे।

मनुष्य ब्रह्मा के पास गये और अपनी व्यथा सुनाई। ब्रह्मा ने कहा कि मनुष्य योनि देव योनि से हीन है, अत: पुरानी स्थिति तो नहीं लौट सकती, परन्तु मनुष्य देवताओं को यज्ञ भाग अर्पित करके उनकी कृपा प्राप्त कर सकता है। मनुष्य ने ब्रह्मा की आज्ञा का पालन किया और देवताओं को यज्ञ भाग अर्पित करने लगा।

परन्तु एक नई समस्या उत्पन्न हो गई। मनुष्य द्वारा अर्पित यज्ञ भाग सही स्थानों पर या सही देवताओं के पास नहीं पहुंच पाता था। अब देवता ब्रह्मा जी के पास पहुँचे और कहा कि मनुष्य तो अपना काम सही रूप में कर रहा है परन्तु हमें उसका सही लाभ नहीं मिल रहा है। यज्ञ भाग इधर-उधर हो जाता है।  इस ब्रह्मा जी ने नई व्यवस्था दी। उन्होंने सर्वव्याप्त अग्निदेव को बुलाया और यह काम सौंपा कि जिस देवता को यज्ञ भाग अर्पित किया जाए, वह सही देवता तक उचित रूप में पहुँच जाए। अग्निदेव सर्वव्याप्त हैं और उन्होंने इस कार्य में अपनी पत्नी स्वाहा का सहयोग लिया।

अब प्रत्येक यज्ञ में जिस देवता के नाम की स्वाहा बोलकर आहुति दी जाती है, वह आहुति स्वाह और अग्नि देवता के माध्यम से सम्बन्धित देवता के पास पहुँच जाती है। अगर स्वाहा बोलकर आहुति नहीं दी गई तो वह आहुति निष्फल हो जाती है।  पितरों को जो आहुति दी जाती है वह स्वधा बोलकर दी जाती है। इन दोनों देवियों को षोड़स मातृका में स्थान प्राप्त है।

 

मूल नक्षत्र में जन्म

भारतीय ज्योतिष में प्रयुक्त 27 नक्षत्रों में से 19वां नक्षत्र मूल नक्षत्र होता है परंतु सामान्य भाषा में हम जिसे मूल में जन्म हुआ कहते हैं, वे ज्योतिष भाषा में गण्डांत नक्षत्र कहलाते हैं। यह संख्या में कुल मिलाकर 6 होते हैं। बुध ग्रह के तीन नक्षत्र और केतु के तीन नक्षत्र मिलाकर कुल 6 नक्षत्र इस श्रेणी में आते हैं। कर्क राशि का अंतिम नक्षत्र आश्लेषा व सिंह राशि का पहला नक्षत्र मघा, वृश्चिक राशि का अंतिम नक्षत्र ज्येष्ठा व धनु राशि का प्रथम नक्षत्र मूल, मीन राशि का अंतिम नक्षत्र रेवती व मेष राशि का अश्विनी ये कुल मिलाकर 6 नक्षत्र गण्डांत नक्षत्र कहलाते हैं। हमेशा बुध का नक्षत्र पहला और उसके बाद वाला केतु का आता है। इन सबके विशिष्ट परिणाम बताए गए हैं।

इन नक्षत्रों में यदि बच्चा जन्म ले तो हर नक्षत्र का अलग-अलग परिणाम बताया गया है- 

मघा - प्रथम चरण में उत्पन्न हो तो माता या नाना को हानि, द्वितीय में पिता को भय, तीसरा चरण शुभ, चतुर्थ चरण में धन लाभ।

ज्येष्ठा - प्रथम चरण में भ्राता को कष्ट, द्वितीय में छोटे भाई का नाश, तीसरे में माता या नानी का नाश व चतुर्थ में पिता को कष्ट।

अश्विनी - प्रथम चरण में पिता को कष्टकारी, शेष तीनों शुभ होते हैं।

आश्लेषा - प्रथम चरण शुभ, दूसरे में पिता के धन का नाश, तीसरे में सास या माता का नाश व चतुर्थ चरण में पिता को कष्टकारी।

रेवती - रेवती के तीनों चरण शुभ, किंतु चतुर्थ चरण घर में भय और कष्टकारी।

ज्येष्ठा अथवा मूल - नक्षत्र के मध्य, दिन में जन्म हो तो पिता को कष्ट।

मूल अथवा आश्लेषा - नक्षत्र के मध्य, रात्रि में जन्म हो तो माता को कष्ट।

रेवती अथवा अश्विनी - नक्षत्र के मध्य, संध्या में जन्म हो तो अपने शरीर को कष्ट।

गण्डमूल नक्षत्रों में जन्में बच्चे किसी न  किसी कारण से कष्टकारी होते हैं। ऐसे बच्चे बचपन में स्वयं भी कष्ट पाते हैं अत: परम्परागत ज्योतिषी आमतौर से कहते पाए गए हैं कि आठ साल तक की आयु का बच्चा कुछ न कुछ कष्ट पा सकता है, परंतु यह भी सत्य है कि गण्डमूल नक्षत्र में जन्में बच्चे जीवन में कुछ विशेष बनते हैं। यह बात मंगलिक बच्चों पर भी खरी उतरती है।

यदि बच्चे के जन्म के दिन गण्डमूल नक्षत्र है तो आमतौर से यह निर्देश दिया जाता है कि पिता उसका मुंह 27 दिन तक नहीं देखे, इसके बाद जब जन्म के 27 दिन बाद वही नक्षत्र आ जाए तो विधिवत गण्ड शांति करवाकर संतान का मुंह देखें। प्राय: इस व्यवस्था का उल्लंघन पाया जाता है, परंतु यह भी है कि जिस परिवार में बच्चे का जन्म हुआ है वह ज्योतिष को मान्यता देता है तो 27वें दिन गण्ड शांति का यज्ञ करवा ही लेता है।

इन 6 नक्षत्रों में भी प्रत्येक नक्षत्र की कुछ - कुछ घटी अधिक कष्टकारी होती है। आश£ेषा, ज्येष्ठा और रेवती की अंतिम चार घटी तथा मघा, मूल और अश्विनी की प्रथम चार घटियाँ दोष कारक मानी जाती है। एक घटी 24 मिनिट की मानी गयी है। एक नक्षत्र का औसत समय 60 घटी या 24 घंटे होता है।

यदि एक घर में दो बालक एक ही गण्डांत नक्षत्र में उत्पन्न हों तो दोनों के लिए महामृत्युंजय जप करा लेना चाहिए जिससे कि किसी को भी कष्ट न आए। यदि खून के रिश्ते में किसी और का भी वही नक्षत्र हो तो भी महामृत्युंजय जप करा लेना चाहिए।

 

क्या ज्योतिष में तिथि निर्णय वैज्ञानिक पद्धति है?

भारत में तिथि निर्णय एक बड़ा व महत्वपूर्ण विषय है और किसी -किसी वार/ त्यौहार पर तिथि निर्णय मुश्किल काम होता है, यहां तक कि कभी-कभी टी.वी. और अखबार में भी इसकी चर्चा हो जाती है परंतु यदि हम तिथि के निर्णय संबंधी धर्म शास्त्र की व्यवस्था को जान लें तो हमें मालूम चलेगा कि यह बहुत वैज्ञानिक पद्धति है।

जब सूर्य पर से चंद्रमा भ्रमण करते हैं अर्थात् सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आते हैं तो अमावस्या होती है। अमावस्या के समाप्त होने से लेकर चंद्रमा के सूर्य से 12 अंश आगे निकल जाने पर प्रथमा, 12 अंश के बाद 24 अंश तक द्वितीया, 24 अंश के बाद 36 अंश तक तृतीया तिथि होती है अर्थात् चंद्रमा एक तिथि का भोग जब तक करते हैं जब तक कि वह 12 अंश या डिग्री की यात्रा पूरी नहीं कर लेते। चंद्रमा एक दिन में औसतन एक नक्षत्र को पार कर लेते हैं। एक नक्षत्र का कुल मान 13 डिग्री, 20 मिनिट का होता है अत: 360 डिग्री के परिक्रमा पथ को पार करने में चंद्रमा को 27 दिन लगते हैं।

चंद्रमा की औसत गति में कभी-कभी परिवर्तन आते हैं। दीर्घ वृत्त में कक्षा पथ होने के कारण गति तेज या धीमी हो जाती है। तेज गति होने पर यदि चंद्रमा 12 अंश पार करने में औसत से कम समय लें तो तिथि क्षय होना माना जाता है। ऐसा तब होता है जब सूर्योदय के बाद तिथि शुरु हो और अगले सूर्योदय से पहले ही चंद्रमा 12 अंश पार कर लें तो तिथि क्षय माना जाता है। परंतु यदि किसी सूर्योदय से पहले तिथि प्रारम्भ हो और अगले सूर्योदय के बाद तक तिथि बनी रहे तो उसे तिथि वृद्धि कहते हैं। ऐसा तब होता है जब चंद्रमा औसत से कम गति से भ्रमण कर रहे हों।

समस्या तब होती है जब तिथि का प्रारम्भ दोपहर या संध्या के समय हो। ऐसी स्थिति में अगले दिन भी दोपहर या संध्या तक वह तिथि चलती रहती है। जनमानस को असुविधा से बचाने के लिए प्राचीन ऋषियों ने इस विषय को धर्म शास्त्र से जोड़ दिया और यह निर्णय लिया कि किसी दिन की वही तिथि मानी जाएगी जो उस दिन के सूर्योदय के बाद तक चलती रहे, इससे विवाद नहीं होंगे। इसका अपवाद वें तिथियाँ हैं जिनमें चंद्र दर्शन प्रमुख आधार है। जैसे कि- जन्माष्टमी, करवाचौथ, षकटचौथ, निर्जला एकादशी इत्यादि। जो व्रत देवताओं के रात्रि जन्म पर आधारित होते हैं जैसे शिवरात्रि या जो व्रत चंद्र दर्शन के उपरान्त ही खोले जाते हैं वहां रात्रिकालीन तिथि को मान्यता दी गयी है।

तिथि गणना अत्यंत वैज्ञानिक है और चंद्रमा की गति पर आधारित है। इसलिए चंद्र की गति पर आधारित तिथि गणना या अन्य गणित को द्क्गणित कहते हैं, अर्थात् चंद्रमा तो पूर्णिमा के दिख रहे हैं परंतु पंचांग में चतुर्दशी दिख रही हो तो पंचांग में संशोधन करके पूर्णिमा दिखाया जाएगा।

 

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