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देश

ज्योतिष की कुछ भ्रान्त धारणाएँ पं. सतीश शर्मा, एस्ट्रो साइंस एडिटर, नेशनल दुनिया

ज्योतिष जगत में सदा से ही मूल ग्रन्थों और मूल सिद्धान्तों के साथ छेड़छाड़ होती रही है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण ज्योतिष के प्रथम प्राचीन 18 आचार्यों में से एक, ऋषि पाराशर द्वारा रचित वृहत पाराशर होराशास्त्र। बड़ा से बड़ा प्रकाशक और  बड़ा से बड़ा ज्योतिषी वृहत पाराशर होराशास्त्र के बहुत सारे श्लोकों को प्रक्षिप्त (बाद में जोड़े हुए) अंश मानता है। इसका निर्णय ग्रन्थ के सभी श्लोकों में साम्य, भाषा की विविधता और व्याकरण के अंतर से किया जाता है। देश की बड़ी संस्था इंडियन काऊंसिल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइन्सेज भी इस बात को लेकर चिन्तित है। ग्रन्थकारों में अगर मतभेद हो तो उसे स्पष्ट रूप में समझा जा सकता है जैसे कि वराहमिहिर कृत बृहत संहिता और भद्रबाहु संहिता में एक जैसे विषय होते हुए भी कहीं - कहीं मतभेद हैं। परन्तु मूल ग्रंथ में नये-नये श्लोक गढ़ कर जोड़े जाने से मूल ग्रंथ में ही विकृति आ जाती है। कुछ पुराणों को लेकर भी यह संशय विद्यमान है।

राहुकाल -

देश के किसी भी मुहूर्त्त ग्रन्थ में राहुकाल का उल्लेख नहीं है। वस्तुतः मुहूर्त्त ग्रन्थों में राहु काल जैसी कोई व्यवस्था ही नहीं है परन्तु इन दिनों बहुत सारी वेबसाइट्स व डिजिटल पंचाङ्ग राहु काल पर विचार करते हैं और उसके आधार पर किसी मुहूर्त्त का भी निषेध कर देते हैं। यह अनुचित है और शास्त्रों के विरोध में जाकर सोशल मीडिया ऐसे विषयों में शास्त्र की मर्यादा का ध्यान नहीं रख पाती और ऐसी बातें चलन में आ जाती हैं।

मजे की बात यह है कि राहु को लेकर जो अन्य व्यवस्था हैं, जो कि शास्त्रोक्त हैं, उन पर तो चर्चा ही नहीं होती, क्योंकि वे गणित पर आधारित हैं और इतना कष्ट कौन करे। उदाहरण के लिए राहु रविवार को पूर्व में, शनिवार को वायव्य कोण में, गुरुवार को दक्षिण में, शुक्रवार और मंगलवार को अग्रिकोण में तथा बुधवार को सदा उत्तर दिशा में रहते हैं। सेनाएँ युद्ध में इसको उपयोग में लाती थीं, क्योंकि यह शत्रुहंता योग है। आज भी चुनाव समर में या अन्य महत्त्वपूर्ण प्रयोजन में इसको काम में लाया जा सकता है। इसी तरह अग्नि पुराण में भी तिथि राहु का वर्णन है। सम्मुख राहु शत्रु नाश करते हैं। विष्टि राहु का प्रयोग भी अग्निकोण में बताया गया है। ये बातें गणित सिद्ध हैं, इन्हें तो प्रयोग में नहीं लाया जाता और राहुकाल जैसी धारणाओं को चला दिया गया है।

कालसर्प -

ज्योतिष के किसी मान्य ग्रन्थ में कालसर्प जैसी किसी भी सत्ता का उल्लेख नहीं किया गया है। यहाँ भी राहु की भूमिका मानी गई है, क्योंकि ज्योतिष में सर्प का समीकरण राहु के साथ किया जाता है। इस नाम से ऐसा लगता है कि जैसे मृत्यु की बात कर रहे हों और काल का नाम भयप्रद हो गया है। जहाँ भय उत्पन्न किया जाता है, वहाँ शोषण भी देखने को मिलता है। उन कर्मकाण्डी पंडितों की तो मौज ही हो गई जिन्हें कालसर्प के नाम से अच्छा काम मिलता है। दुविधा यह है कि काल सर्प की तथाकथित पूजा करने के बाद भी दोष दूर नहीं होता और जीवन में दुःख आते ही रहते हैं। फिर जीवन की कोई बहुत बड़ी घटना 2 घण्टे की पूजा से कैसे समाप्त हो सकती है। मेरी समझ में यह इसी तरह की एक बात है कि कोई बुखार होने पर बुखार की दवा की जगह मधुमेह की दवा देने लग जाए। ऐसे तो रोगी कभी ठीक होगा ही नहीं। ज्योतिष ग्रंथों में राहु-केतु से सम्बन्धित ऐसे कई योग हैं। पाराशर ने भी सर्पदोष का विवरण दिया है, जिसमें राहु को भी एक कारण माना गया है जो कि संतान ना होने या नष्ट होने को लेकर है। इस भ्रम की कीमत बहुत बड़ी है। अकारण ही भारत वर्ष भर में सैंकड़ों करोड़ का खर्चा करा दिया जाता है।

नैऋत्य कोण में मास्टर बेडरूम -

यह भ्रम भी तेजी से फैला है, जबकि दुनिया के किसी भी ग्रन्थ में साऊथ-वेस्ट में मास्टर बेडरूम होने का प्रस्ताव ही नहीं है। वास्तु ग्रंथों में नैऋत्य कोण में शस्त्रागार बताया गया है। अब शस्त्र रखना तो कानून सम्मत नहीं है परन्तु आधुनिक वास्तुशास्ति्रयों ने इस कोण को यंत्रागार के रूप में बदल दिया है। यंत्रों को भी एक तरह का हथियार माने जाने से हमें आपत्ति नहीं है। मैंने कुछ पुराने महलों में आज भी नैऋत्य कोण में शस्त्र रखने हुए देखे हैं। जयपुर राजघराने के पास जयगढ़ किला आज भी उनकी निजी सम्पत्ति है। उन्होंने इसे पर्यटन स्थल के रूप में प्रचारित भी किया हुआ है। उस जयगढ़ किले में आज भी नैऋत्य कोण में सारे पुराने हथियार और उन्हें सिद्ध करने के मंत्र भी प्रदर्शित है। टिकिट लगती है, कोई भी जाकर देख सकता है।

शास्त्रों में दक्षिण दिशा को ही गृहस्वामी के शयन के लिए उपयुक्त माना गया है, नैऋत्य कोण को नहीं।

गिफ्ट में मिलने वाले यंत्र फल देते हैं-

बहुत सारी ज्योतिष पत्रिकाएँ ताम्र यंत्र बाँटती रहती हैं और बाजारों में भी खूब मिल जाते हैं। आम धारणा यह है कि इन यंत्रों को पूजा घर में रख लेने से शुभ परिणाम मिलता है। वस्तुतः यह यंत्र शो-पीस से अधिक कुछ नहीं होता। घर में रखी हुई मूर्तियाँ हों या ताम्रयंत्र, ये तब तक फल नहीं देते, जब तक कि इन्हें सिद्ध नहीं किया गया हो या इनकी प्राण प्रतिष्ठा नहीं की गई हो। आप पूजा घर में कितने ही यंत्र इकट्ठे कर लो, चाहे एक से अधिक लक्ष्मी जी की तस्वीरें लगा लो, ये सब निष्फल हैं। हाँ, विधि विधान से की गई पूजा अवश्य सार्थक हो सकती है।

मंगल दोष 28 की उम्र के बाद समाप्त हो जाता है-

बहुत सारे लोग जब जन्म पत्रिका दिखाने आते हैं तो खुद ही तर्क देने लगते हैं कि ‘‘मांगलिक होने का दोष तो 28 की उम्र के बाद समाप्त हो जाता है ना?’’ यह सच नहीं है। मंगल दोष का प्रभाव जीवन भर रहता है, वस्तुतः मंगल ग्रह का असर 28 वर्ष पूरे होने पर देखने में आता है, बुध का 32 वर्ष, शनि का 36 वर्ष, राहु का 42 वर्ष, केतु का 48 वर्ष, बृहस्पति का 56 वर्ष। जीवन के इन वर्षों में इन ग्रहों के प्रभाव देखने को मिलते हैं। मोटे तौर से 22 से 24 वर्ष में सूर्य, 25 में चन्द्रमा, 25 से 28 तक शुक्र का प्रभाव, 28-32 तक मंगल का समय, 32-36 तक बुध का माना जाता है और ये ग्रह प्रभाव दिखाते हैं। मंगल को लेकर यह गलत धारणा बन गयी है कि 28 के बाद मंगल का दोष समाप्त हो जाता है।

मंगल दोष उच्च राशि या स्व राशि में होने पर समाप्त हो जाता है-

यह भी पूरा सच नहीं है। भगवान राम के सप्तम भाव में उच्च राशि के मंगल स्थित थे, परन्तु फिर भी उन्हें विरह वेदना झेलनी पड़ी। ग्रहों का नकारात्मक प्रभाव भी शून्य स्तर तक कभी भी नहीं आता है परन्तु वे जीवन भर अपना असर देते रहते हैं। मंगल दोष भी जीवन भर के लिए सक्रिय होता है।

मंगल के लिए हनुमानजी और बुध के लिए गणपति-

यह भी बड़ा भ्रम है। लोग मंगल ग्रह की साधना के लिए हनुमान चालीसा पढ़ते हैं। हनुमान चालीसा पढ़ना तो ठीक है परन्तु इससे मंगल उपेक्षित रह जाते हैं, जबकि सिद्ध मंगल को ही करना है। उचित यह है कि जन्म पत्रिका में जब भी मंगल का प्रकोप हो तो मंगल ग्रह के लिए प्रशस्त मंत्र का जप तो करना ही चाहिए। चाहे हनुमान जी का अलग से पाठ कर लें। इसी तरह से ज्योतिषी जब बुध ग्रह का उपाय बताता है तो लोग गणेश जी का पाठ करके इतिश्री मान लेते हैं। उचित तो यह रहता कि आप बुध का प्रकोप होने पर बुध ग्रह के लिए प्रशस्त मंत्र का पाठ तो करें ही और चाहें तो गणेश जी का भी करते रहें। इससे बुध ग्रह को आपके मंत्र सीधे ही पहुँचेंगे।

 

मानस के शकुन

सरस्वती शर्मा

गतांक से आगे ......

सुनु मन्थरा बात फुरि तोरी, दाहिनि आँखि नित फरकइ मोरी

दिन  प्रति देखऊँ राति कुसपने, कहउँ न तोहि मोहबस अपने।

अर्थात् कैकई को आँख के फरकन व रात्रि के कुसपनों से अनहोनी घटना की सूचना तो मिल रही थी किन्तु समझने में ही कैकई की बुद्घि कमी प्रतीत होती है। शकुन के इशारे को वह दूसरे रूप में सोच रही है। अयोध्या काण्ड के ये दोनों उदाहरण शकुनों का सही-सही अर्थ न समझ पाना प्रतीत होता है। अतः उधर श्री भरत जी को भी शकुन हो रहे हैं -‘अनरथु अवध अरंभेऊ जब तें। कुसगुन होंहि भरत कहुं तब तें।

‘देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहि कटु कटि कलपना।

बिप्र जेवांईं देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना।’

यहाँ पर तुलसी दास जी स्वप्नों का इशारा बता रहे हैं और श्री भरत जी को कुस्वप्नों के निदान के लिए शिव अभिषेक करते हैं। ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं अर्थात् उनको अनर्थ होने की सूचना देने वाले स्वप्न दीख रहे थें।

आगे वन में निषाद राज जी द्वारा भरत आगमन पर एक विशेष शकुन हुआ-

‘दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू।

एतना कहत छींक भइ बाएँ। कहेउ सगुनिअन्ह रवेत सुहाए।

बूढ़ एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारि।

रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहई अस बिग्रह नाहिं॥‘

अर्थात् एक भील जाति के लोगों द्वारा भी छींक की (बाँई) प्रतिक्रिया यही है कि यह शकुन ‘ सगुन है असगुन नहीं’  तुलसी जी की इतनी बारीकी से सगुन व असगुन की व्याख्या देखकर प्रतीत होता है कि शकुनों का पूर्ण समावेश हुआ है मानस में। छींक का शुभ अशुभ प्रभाव भी शकुन विचार का एक उदाहरण हमें यहाँ मिलता है।

लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषाद।

त्रिटहि सोच होइहि हरषु पुनि परिनाम विषाद॥

अर्थात् कुछ इस प्रकार के सकुन हुए निषाद जी के गुनकर कहा कि रामजी से भेंट होगी, विषाद हटेगा, हर्ष होगा, किन्तु अन्त में दुख होगा। कितना सटीक शकुन विचार है निषाद राज गुह का।॥

सुन्दर काण्ड

सीताजी अशोक वाटिका में रहती हैं उनकी रक्षिका त्रिजटा नाम की एक राक्षसी है। उसका स्वप्न विचार देखिए-

सपने बानर लंका जारी, जातुधान सेना सब मारी।

खर आरुढ़ नगन दशशीशा, मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।

एहि विधि सो दच्छिन दिसी जाई, लंका मनहु विभिषण पाई।

नगर फिरी रघुवीर दोहाई, तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥

यह सपना मै कहऊँ पुकारी, होइहि सत्य गएं दिनचारी।

अर्थात् रावण मरण, विभिषण को राज्य, सीता वापसी सभी कुछ तो उसको स्वप्न से पता चल गया।

लंका काण्ड –

रावण को गर्व वश शकुन का ‘सगुन असगुन’  विचार भी जाता रहता है-

अति गर्व नई सगुन, असगुन स्रवहि आयुध हाथ ते

भट गिरत रथ ते वाजि गज चिक्करत भाजहि साथ ते

गोमाय गीध कराल खर, रव स्वान बोलहिं अति घने।

जनु कालदूत उलूक बोलहिं, बचन परम भयावने॥

स्यार, गीध, कोए, गदहे का शब्द कुत्तों का बोलना उल्लू का भयानक शब्द सभी असगुन हैं।

मन्दोदरी को रावण के संकट की व मरने की सूचना कुछ इस प्रकार मिली-

असुभ होन लागे तब नाना, रोवहि खर सृकाल बहुस्वाका।

बोलहि खग जग आरति हेतू। प्रकट भए नभ जहँ तहँ केतू।।

दस दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा॥

मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्रवहिं नयन मग बारी॥

प्रतिमा रुदड़ि पनिपत नभ अति बात बह डोलत मही।

बरसहि बलाहक रुधिर कच रज असुभ अतिसक को कही।।

 उतपात अमित बिलोकि नभ सुर विकल बोलहि जय जय।

 सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए।।

इस प्रकार प्रकृति जनित उत्पात का वर्णन मानो रावण की मृत्यु की सूचना दे ही रहा है।

पुनः रावण युद्घ से सीताजी डरी हुई है कि रावण के सिर पुनः पुनः जीवित हो जाते हैं किन्तु सीता जी को सगुन हुए-

अति भयऊ बिरह उर दाडू, फरकेउ बाम नयन अरु बाहूँ

सगुन विचार धरी मन धीरा। अब मिलिहहि कृणल रघुबीरा।

इस प्रकार आकाश में केतु प्रकट हो या फिर प्रकृति का उत्पात, मूर्तियां रुदन करती दीखें या पृथ्वी हिलने लगे सभी अशुभता के सूचक हैं।

 

हस्त विज्ञान

हाथ का अध्ययन करने के लिये हम हाथ की लम्बाई, चौड़ाई को भी ध्यान में रखते हैं। ये पांच तरह की होती है- 1. बड़ा, 2. बहुत बड़ा, 3. छोटा, 4. बहुत छोटा और 5. औसत हाथ (न बहुत बड़ा न छोटा) हर नाप का अपना महत्त्व है। व्यक्ति के गुण अवगुण उसके हाथ के नाप के आधार पर भी होते हैं। हाथ को अध्ययन की दृष्टि से हम दो भागों में बांटते हैं। एक कलाई के आगे से लेकर हथेली सहित होता है जो कि हाथ कहलाता है व दूसरा जो हाथ के अंदर रेखायें होती हैं वह हथेली कहलाती है।

बड़े हाथ - जिन व्यक्तियों के बड़े हाथ होते हैं वे हर बात की बारीक जानकारी करते हैं। उनके अन्दर विवेचन करने का गुण होता है। बड़े हाथ सबसे अच्छे माने जाते हैं। ऐसे हाथ वाले व्यक्ति अपने प्रतिदिन के कार्यों के साथ-साथ बड़े-बड़े काम भी कर सकते हैं। उनमें क्लर्क, ठेकेदार, ड्राइवर, माली, होटल मैनेजर व टाइपिस्ट होने के गुण होते हैं।

बहुत बड़े हाथ - जिन व्यक्तियों के ऐसे हाथ होते हैं वे हर बात को विस्तार से जानना चाहते हैं जो कि हो नहीं पाता है। इसलिये वे कभी संतुष्ट नहीं होते तथा लोग उन्हें सनकी कहते हैं।

छोटे हाथ - छोटे हाथ वाले तेज बुद्धि, ऊँचे विचार व भावुक स्वभाव के होते हैं। वे विषय के विस्तार में जाना नहीं चाहते बल्कि केवल प्रमुख बातें ही जानना चाहते हैं और बड़ी जल्दी निर्णय ले लेते हैं। वे अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिये व सफलता पाने के लिये हर संभव उपाय करते हैं। अधिकतर वे बड़े अक्षर लिखते हैं।

बहुत छोटे हाथ - ऐसे व्यक्ति तेज स्वभाव के होते हैं। जिसके कारण वे कभी-कभी क्रूर कार्य करते है। उनके विचारों व कार्यों में सामंजस्यता नहीं होती यद्यपि वे पढ़े-लिखे होते हैं।

औसत हाथ - ऐसे व्यक्ति अच्छी कल्पना वाले होते हैं तथा उनके विचार व स्वभाव में संतुलन होता है, वे बुद्धिमान होते हैं और जीवन की समस्याओं का बिना किसी शिकायत के सामना करते हैं।

हाथ की बनावट से भी व्यक्ति के बहुत से गुणों का पता लगता है। इनका वर्गीकरण इस प्रकार कर सकते हैं-

1.            कोमल हाथ,           2.            गुदीला हाथ,

3.            सख्त हाथ,             4.            भारी हाथ,

5.            मोटे हाथ व            6.            पतले हाथ।

 

 

1.कोमल हाथ - ऐसे व्यक्ति कल्पनाशील होने के कारण साहित्यिक स्वभाव के होते हैं। अधिकतर स्ति्रयों के ऐसे हाथ होते हैं। यदि पुरुष का हाथ ऐसा हो तो मानना चाहिये कि उसका स्ति्रयोचित स्वभाव अधिक है। वे दयालु और सहानुभूति पूर्ण होते हैं।

2. गुदीला हाथ - ऐसे व्यक्ति आलसी, स्वार्थी, हृदयहीन व आसान जिन्दगी चाहने वाले होते हैं। वे केवल अपने आराम की बात सोचते हैं और समझते हैं कि दुनिया केवल उन्हीं के लिये बनी है। वे अपनी वाणी व बुद्धि का प्रयोग दूसरों को नीचा दिखाने के लिये करते हैं। वे दूसरों को उपदेश देने में कुशल होते हैं ये कभी नहीं सोचते कि वे स्वयं क्या करते हैं।

3. कठोर हाथ - ऐसे हाथ व्यवहारिक व मेहनती व्यक्तियों के होते हैं। वे कल्पनाशील कम होते हैं। वे जीवन की समस्याओं का साहस पूर्वक डटकर मुकाबला करते हैं। वे अपनी भावनाओं का प्रदर्शन नहीं करते हैं वरन् दृढ़ निश्चयी आगे बढ़ने वाले व विश्वास के योग्य होते हैं।

4. भारी हाथ - ऐसे व्यक्ति अपने लाभ के लिये दूसरों को दबाते हैं और इस प्रकार अपने अधिकार का प्रदर्शन करते हैं। वे दूसरों को कष्ट पहुंचाने में खुशी हासिल करते हैं। जल्लाद, काला बाजारी करने वाले व कत्ल करने वालों के ऐसे हाथ होते हैं। उनमें तनिक भी नैतिकता नहीं होती।

5. मोटे हाथ - मोटे हाथ वाले व्यक्ति, सनकी, अन्धविश्वासी, स्वार्थी, लोलुप व क्षुद्र हृदय वाले होते हैं। वे अड़ियल स्वभाव के भी होते हैं।

6. पतले हाथ - ऐसे व्यक्तियों में शक्ति की कमी होती है। जीवन की समस्याओं का सामना नहीं कर पाते। ऐसे व्यक्ति जागरूक नहीं होते व दूसरों से आशा करते हैं कि वे उनकी सभी आवश्यकतायें पूरी करें उनके सुख व आराम का ख्याल रखें।

धनु राशि के लिए रत्न

आपके लिए पुखराज और माणिक रत्न शुभ हैं ।

1. पुखराज पहनने से आपका मान-सम्मान बढ़ेगा। बृहस्पति के फलों में थोड़ी सी वृद्धि होगी। आत्म-विश्वास बढ़ेगा। आपकी लड़ाई की भावना बढ़ेगी और किसी भी क्षेत्र में आसानी से हार नहीं मानेंगे। परिस्थितियाँ चाहे आपके पक्ष में हों या नहीं। आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी और जनसंपर्क भी अच्छा रहेगा। अपने जनसंपर्क के बल पर कामों को बनाने में आसानी होगी।

आप सवा पाँच रत्ती का पुखराज सोने की अँगूठी में, शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को, अपने शहर के सूर्योदय के समय से एक घंटे के भीतर, सीधे हाथ की तर्जनी अँगुली में पहनें। (सूर्योदय का समय आप अपने शहर के स्थानीय अखबार में देख सकते हैं)। पहनने से पहले पंचामृत (दूध, दही, घी, गंगाजल, शहद) से अँगूठी को धो लें। इसके बाद ॐ बृं बृहस्पतये नमः मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें। इसके बाद ही रत्न धारण करें।

2. माणिक पहनने से आपके भाग्य में बढ़ोत्तरी होगी और कार्यों में आ रही रुकावटें दूर होंगी। भाग्यबल से काम बनेंगे। आप बहुत अधिक मेहनत करते हैं और आपको यह शिकायत बनी रहती है कि मेहनत से पूरे फल नहीं मिल रहे हैं, ऐसे में माणिक आपको मदद करेगा। समाज के बुद्धिजीवी व्यक्तियों से सहयोग मिलेगा और सहयोग से ही काम बनेंगे, धन में भी बढ़ोत्तरी होगी।

आप सवा पाँच रत्ती का माणिक सोने की या ताँबे की अँगूठी में, शुक्ल पक्ष के रविवार को, अपने शहर के सूर्योदय के समय से एक घंटे के भीतर, सीधे हाथ की अनामिका अँगुली में पहनें। (सूर्योदय का समय आप अपने शहर के स्थानीय अखबार में देख सकते हैं)। पहनने से पहले पंचामृत (दूध, दही, घी, गंगाजल, शहद) से अँगूठी को धो लें। इसके बाद ॐ घृणिः सूर्याय नमः मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें। इसके बाद ही रत्न धारण करें।

मिजोरम

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